• डॉ अशोक द्विवेदी

‘कबीर कूता राम का/मुतिया मेरा नाउँ।
गले राम की जेंवड़ी/जित खैंचे, तित जाउँ।।’

कबीर उत्तर भारत के अइसन फक्कड़ मौला सन्त रहलन, जे अपना सहज लोकचर्या आ ठेठ बोली-भाषा के कारन सबसे अलग पहिचान बनवलन। उनका कविता में ‘अनुभूत सत्य’ का प्रेम पगल भक्ति के अलावा अगर कुछ अउर बा त, ऊ बा आदमी क आदमीयत बचावे बनावे खातिर विचार, सलाह; झिड़की आ दू टूक खुलासा करे वाली एगो (‘अपढ़ संत’ के) सहज बानी। ऊ ‘बानी’ जे भाषा के मोहताज नइखे। कबीर ‘कागद की लेखी’ से ना बलुक ‘आँखिन देखी’ से अनुभव आ अभिव्यक्ति कइलन। उहो आँखि हृदय के आँखि रहे। एही से उनका बानी में जथारथ के रूखर रूप-अपना सुभाव में आंतरिक विसंगति का साथे प्रगट भइल। एही से उनकर कविता छिछिल भावुकता आ दिमागी कारीगरी के बजाय गहिर अनुभूति में पगल।

नामी गिरामी आलोचक उनका कविताई आ भाषा के अपना अनुसार अलग-अलग ढंग से देखल लोग। बहुत लोग उनका लोकज भाषा के अनगढ़ रूप देखि के, ओके ‘सधुक्कड़ी’, पंचमेल आ मेझरा भाषा कहल आ एके उनकर कमी मानि के तुलसी, सूर आ जायसी से अलगा पाँति में बइठावे के कोशिश कइल। बहुत लोग भाषा छोड़ि उनका कथ कहनाम प बोल-बतिया के रहि गइल। एगो अनपढ़ जोलहा से सन्त बने तक के उनकर सफर सांसारिक होइयो के, मन आत्मा से असंसारिक रहे। उनका साखी, सबद, पदावली में भाषा के जवन भदेसपन आ रुखराहट बा ऊ सिद्ध करत बा कि ऊ बोले-बतियावे, गावे-सुनावे में जवना भाषा के प्रयोग कइलन, ऊ ओऽघरी के जनभाषा रहे, जवन अवधी से जोरियाइल एगो विशाल भोजपुरी क्षेत्र में बोलल जात रहे।

भाषा से काम लेत खा कबीर के कबो सोचे, टोवे भा हकलाए के ना परल। जवन मन में आइल, ऊ भाषा से दरेर के कहवा लिहलन। उर्दू, फारसी से लगाइत पंजाबी, राजस्थानी तक के शब्द आप से आप उनका जबान प आ गइल। हिन्दू से बतियावत खा हिन्दूआनी शब्द, शैली आ मुसलमान से बतियावत खा उर्दू फारसी के शब्द सहजे उनका भाषा में मिल गइल। ओघरी के प्रचलित काव्य भाषा के शब्द होखेऽसन भा संत-समागम में भेंटाइल शब्द। कबीरदास जी के आपन बात कहत खा, उनहन के शामिल करे में कवनों गुरेज ना बुझाइल। बोले बतियावे भा गावे गुनगुनाए में उनके कबो असुविधा एसे ना भइल काहे कि ऊ भाषा के जरूरत का मोताबिक गढ़ बना लेसु। शब्दन के तूरे मरोरे में उनका कबो संकोच ना बुझाइल। डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के विचार रहे कि कबीर जवन बात जवना तरीका से कहेके रहे, भाषा से कहलवा लिहलन। बन परल त सोझ-सोझ, नाहीं त ‘दरेरा’ देके। भाषा प अपना एही जबर्दस्त पकड़ का बदौलत ऊ अइसन काव्य-संपदा दे गइलन, जवन ऊ समाज के दिहल चाहत रहलन। लोक जीवन के लोकज रूप के ओकरा सहज सोभाव में अभिव्यक्त करत खा कबीर साधारण आदमी के बात-व्यौहार क तरीका अपना लेसु। प्रेम आ भक्ति में समर्पित विनयी हो जासु। ईहे कारन रहे कि ऊ सहजे, गूढ़ दार्शनिक तत्त्व के निरूपणो क दिहलन।

कबीर के विद्रोही सुभाव ओघरी अउर प्रखर हो गइल बा जब ऊ समाज में व्याप्त विसंगति आ पाखण्ड पर क्षोभ से चोट कइले बाड़न। कर्मकाण्डी पूजा आझुठिया साधना के ढोंग उनका ना सुहाइल। अपना धारदार आ आक्रामक भाषा का जरिये कबीर नकलीपन आ ढोंग प चोट कइलन- पोंगापंथी, ढोंगी, पंडित आ मुल्ला मोलवी केहू उनका से ना बाँचल। झुठिया टीका फाना करे आ माला फेरे वाला पाखण्डी लोगन के ऊ तनिको ना बकसलन। ऊँच-नीच आ जाति पाँति के देवाल खड़ा करे वालन के ऊ कतने बेर फटकार लगवलन। उनका एह लट्ठमार भाषा आ तौरतरीका से बहुत लोग का बुझाला कि ऊ घमंडी समाज सुधारको रहलन। बाकि ना। ऊ त खाली सीख आ सलाहे देले बाड़न। निहायत अपनाइत से मीठ झिड़की देत ऊ आगा बढ़ि गइल बाड़न। जवना-जवना बात के लेके लोगन में गलतफहमी आ अझुरा लउकल बा, ओके बहुत सादगी से सझुरा देले बाड़न, आ ईहो कहे से नइखन चुकल कि –

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ पंडित भया न कोय ।
ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय ।।
…. …. …. ….. …. …. ….
काजी कौन कतेब बखाने ।
पढ़त-पढ़त केते दिन बीते गति एकै नहिं जानै ।।

पोथी-पतरा आ सास्तर-वेद क अझुरहट से अलगा, बाहरी आचार आ संस्कार क परपंच छोड़ि के, ऊ सोझ सोझ प्रेम-भगति आ सहज साधना के पंथी बने में विश्वास कइलन। समाज-सुधारक ना, खालिस भक्त। समर्पित आ निष्ठावान भक्त। सहज अनुभूति से रचाइल उनका भावबोध में जवन सादगी बा ऊ अनुभव कइल जथारथ के चलते बा। गुरु आ ईश्वर के प्रति उनका अडिग प्रेम आ निष्ठा के चलते ईहे सादगी मूरख से मूरख के राह दिखा दिहलस – गूढ़ से गूढ़ बात सोझ आ सीधा सादा ढंग से समझा दिहलस। ई ‘सादगी’ कबीर का काव्य भाषा आ बानी के मूल शक्ति बा।

कबीर शिक्षित त रहलन ना, बाकी बड़-बड़ सन्त ज्ञानी लोग का सत्संग से उनकर अन्तर्दृष्टि आ विश्लेषण शक्ति दूनों प्रखर भइल। अनुभूति से उपजल भाषा उनका प्रेम के ‘अढ़ाई आखर’ के अउर विस्तार आ गहिराई देले बिया। तबे ऊ ‘प्रेम के अकथ कहानी’ के समुझा बुझा सकल बाड़न। उनका उलटवाँसियनों में गूढ़ अर्थन के सृष्टि भइल बा। कबीर का खर आ रुखर भाषा में जवन भदेसपन बा ऊ लोक जथारथ के रुखर मार्ग अनुसरण कइला का कारन बा। ऊ जथारथ के जतना कठोर आ रुखर रूप देखले बाड़न ओके आत्मा का गहिराई ले महसूसो कइले बाड़न। ‘आँखिन देखी’ के साँच अभिव्यक्ति में ऊ संकोच नइखन कइले। एही से उनका खरोपन में एगो खास किसिम के मिठास बा। जइसे ऊखि के कड़ेर पोर छीलि के ओकरा गुल्ला में भिनल रस के मिठास के अनुभव कइल जा सकेला, ओइसहीं एह सन्त कवि के भाषा में लोकज सहजता आ मिठास के अनुभव कइल जा सकेला। श्यामसुन्दर दास जी एही मिठास के कबीर के ऊ भाषिक विशेषता मनले बाड़न जवना में उनका अभिव्यक्ति के गँवारूपन डूबि जाला। आदमी के आदमीयत बनल रहो एकरा खातिर ऊ गँवारूए ढंग से साफ, सोझ कहलन। एह कहनाम में कहीं रूखर कठोरता त कहीं मार्मिक मधुरता बा – कहीं-झिड़की बा त कहीं बेलाग लपेट के सोझ साफगोई –

एक बूँद, एक मल मूतर, एक चाम एक गूदा
एक जाति थै सब उपजा कौन ब्राह्मण कौन सूदा।
…. …. …. ….. …. …. ….
साकत बाँभण मति मिलै बेष्नों मिलै चंडाल
अंकमाल दे भेंटिये मानी मिले गोपाल ।
…. …. …. ….. …. …. ….
कहे कबीर एक राम जपहु रे, हिन्दु तुरक न कोई ।

मनुष्य के मानुष धरम बनल रहो, ऊँच-नीच आ जाति-पाँति के भेद भाव मिटो, सब एक दोसरा से प्रेम करो, ईहे कबीर चाहत रहलन। फिजूल के ढोंग, पूजा, छुआछूत, रोजा, व्रत, नमाज, तीरथ बरत ई कूल्हि कबीर के ना रुचल- ऊ आडंबर आ पाखण्ड से अलगा सहज साँच प्रेम आ भगतिए के मनले बाड़न। जनमे से केहू बाभन, शूद्र, भा हिन्दू-मुसलमान ना होला।

जो तूँ बाँभन बँभनी जाया ।
तो आन बाट ह्वै काहें न आया ।।
जौ तूँ तुरक-तुरकनी जाया ।
तौ भीतर खतना क्यों न कराया ?

जनम का बाद समाज आ करमकांड क घेरा कबीर के कइसे रुचित? आखिर सब जीवे ह – हाड़ माँस के पिण्ड – सभका भीतर ऊहे खून दउरत बा। सब कवनो न कवनो माइये का कोख से जनमल बा, फेर कइसन भेदभाव? कइसन छुआछूत?

काहैं को कीजै पांडे छोति विचारा ।
छोतिहि तै उपजा संसारा ।।
हमारे कैसे लोहू तुम्हारे कैसो दूध ।
तुम कैसे बाम्हन पांडे हम कैसे सूद ?

सब एक्के ईश्वर के बन्दा ह। नाम भलहीं अलगा-अलगा होखे। ओके रिझावे आ मनावे के तरीको अलगा-अलगा हो सकेला बाकि ऊ हर तरह से कबीर-खातिर एक्के बा। ऊ ‘मस्जिद चुनाइ’ के मुल्ला अस ‘बाँग’ नइखन देत, ना ‘पूजा-अरचा’ क के बउरात बाड़न –

हमरे राम रहीम करीमा, कैसे अलह राम सति सोई ।
बिसमिल मेटि बिसंभर एकै, और न दूजा कोई ।।

निर्गुन ब्रह्म के सूखल दर्शन वाला रास्ता छोड़ि के कबीर, ‘प्रेम-भगति’ क राह पकड़ल ज्यादा ठीक समझलन। ई राह उनका अस मेहनत मसक्कत सेकपड़ा बीनि बेचि के जिए खाये आ रहे वाली लौकिक राह रहे। गृहस्त जीवन में रहि के कामधाम कइके लोकरीति आ धर्म के अपनावत सहज ढंग से साधना कइले का कारन ऊ सन्त कहइलन। ऊ दोसरा साधु-फकीर-महात्मा लेखा ना जियलन, आपन अरजल खइलन आ अपना प्रिय से प्रेम के लौ लगवलन। लौकिक गहृस्थ का राह से गइले में ऊ अच्छा-बुरा, नीक-जबून के चिन्हलन। माया उनहूँ के भरमवलस, एही से ऊ ओसे बराबर सजग रहे के सीख देहलन –

इक डाइन मेरे मन बसै ।
नित उठि मोरे जिय को डसै ।।
या डाइन के लरिका पाँच रे ।
निसदिन मोंहि नचावै नाच रे ।।

पाँच लइका – काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर – कौनों एक दुसरा से कम ना आ ऊपर से ऊ खुदे ‘तिरगुन फाँस’ लेले डोलि रहलि बिया माया ‘ठगिनी’। अपना ‘मधुरी बानी’ का कारन ऊ जगहो बना लेले बिया। एसे निस्तार पावे खातिर कबीर सभका बीचे रहियो के, कूल्हि लौकिक ढंग ढर्रा का बीच, कूल्हि से विमुख हो गइलन। ऊ कुछ पकड़लन ना – छोड़त चलि गइलन, जल में ‘अउँधा घड़ा’ बन गइलन – ओमें ना त पानी भरी, ना ऊ डूबी – ‘औंधा घड़ा न जल में डूबे’- पवँरत पवँरत देखलन कि ‘नलिनी’ कुम्हिलाइल बिया – उनका जिज्ञासा भइल, पुछलन –

जल में उतपति जल में बास
जल में नलिनी तोर निवास ।
ना तनि तपति न ऊपर आगि,
तोर हेतु कह का सनि लागि ?

गुरु-ज्ञान आ उनका कृपा से उनके एह ‘माया जल’ आ ‘माया दीपक’ से उबार मिल गइल। ‘राम’ आ ‘रघुनाथ’ का सिरजल माया से छुटकारा रामे दिया सकेलन। उनके राम का नाँव से शक्ति मिलल ऊ धन्य हो गइलन – ‘हरि तजि जियरा बटहूँ ना जासी’। कबीर के इ सच नीके समुझ में आ गइल रहे कि जवन कुछ लउकत बा ऊ बाहरी व्यौहारे ह, ‘राम’ त अगम अपार हउवन। शरीर में दउरत लोहू आ सुन्दर चाम झूठ आ नाशवान ह, साँचा रामे हउवन, जेके हर घरी अपना भीतरे देखल जा सकेला –

कहे कबीर विचारि करि जिनि कोई खोजे दूरि
ध्यान धरौं मन सुद्ध करि राम रह्या भरपूरि ।
कहै कबीर विचारि करि झूठा लोही चाम
जा या देही रहित है सो है रमिता राम ।

ऊ अपना संगे-संगे दोसरो के चेतवलन ‘लोका जानि न भूलो भाई!’ फेर कहलन ‘सहजै सहजै सब गये, सुत-वित-कामिणि-काम। एकमेक है मिलि रह्या हासि कबीरा राम।’ ऊ राम से ‘लौ’ लगा लिहलन आ धन्य हो गइलन, बाकिर एकरा खातिर ओह गुरु के धन्यवाद देबे से ना चुकलन जेकरा प्रेरना से उनकर अज्ञान दूर भइल-

तोहिं मोरि लगन लगाए फकिरवा ।
सोवत ही मैं अपने मन्दिर में,
शब्दन मारि जगाए रे फकिरवा

‘अनचिन्हार’ के ‘चिन्हावे’ वाला, अगम अकथ ‘हरि’ के प्रेम-भगति-रस पियावे वाला ओह गुरु कृपा का आगा कबीर हमेसा विनयी आ कृतज्ञ रहलन। ऊ ‘पुरइनि’ के ‘पात’ नियर जल में ‘पइसार’ कइलो पर जल से विरत रहलन। जइसे पुरइनपात पर जल छटकि जाला, कबीर ओइसही अपना के बना लिहलन। प्रेम-भगति-रस के सवाद आ आनन्द गुरुवे का कृपा से मिलल। आ ऊ अब एकहाली मिलि गइल त फेर कहाँ छूटे मान के रहे। कबीर रस पियत-पियत ओही ‘महारस’ में बहि गइलन –

धावत जोनि जनम भ्रमि थाके,
अब दुख कै हम हारयौ रे ।
कहि कबीर गुरु-मिलन महारस,
प्रेम-भगति विस्तारयो रे ।।

एक लेखे एकदम खालिस भक्त रहलन कबीर। एही से अपना अकथ, अरूप आ अगम ब्रह्म के समझे आ बतावे खातिर उनके प्रचलित शब्द, संकेत आ प्रतीकन के प्रयोग करे के परल। अनिर्वच खातिर बड़-बड़ ज्ञानी लोग के वाणी काम ना करे – कबीर त भरसक बतावे के कोसिस कइलन आ ऊहो समकालीन प्रचलित लोक भाषा के काम भर गढ़ि के। उनका काव्य भाषा में जवन पछाही भदेसपन आ लोकरंग चटक होके उभरत बा ऊ कबीर के सुनल सुनावल आ समझल बूझल शब्द-शक्ति का कारन बा। अवधी के एगो खास छाँही लेले ई भाषा ओह घरी के भोजपुरिये ह जवना के कबीर ‘पूरबी’ कहि के संकेतित कइले बाड़न –

हम पूरब के पुरबिया जात न पूछे कोय ।
जात पात सो पूछिये, धुर पूरब का होय ।।

कुछ विद्वान लोग का मोताबिक एह पूरबीपन के कारन – ‘अध्यात्मिको’ बा – ‘पूरब दिसा हंस गति’ आ ओकरा ‘सन्धि’ के बूझे खातिर ई जाने के परी कि ई ‘हंस-गति’ आ ‘सन्धि’ का ह? साँच पूछीं त ई गति जीव के प्रेम-भगति वाली गति ह जवन ध्यान आ समाधि का जरिया ‘सन्धि’ करे जा रहलि बिया। ई संधिये ऊ अलौकिक अनुभूति हऽ जवना के कबीर कई बार जिकिर कइले बाड़न आ कई ढंग से। एह स्थिति के सभे ना बूझी। ऊहे बूझी जे एह स्थिति से गुजरि के ओकर अनुभव कइले होई। ई ‘गूंगा के गुड़’ ह – प्रेम-मिलन के अकथ कहानी एकरे से जामल बा – ई इसारा वाली वाणी से कुछ कुछ समझावल जा सकेला। ऊहो पूरा पूरा ना –

अकथ कहानी प्रेम की कछू कही ना जाइ ।
गूँगे केरी सरकरा बैठा ही मुसुकाइ ।।
…. …. …. …. …. ….. …. …. ….
सैना बैना करि समुझावो, गूँगे का गुड़ भाई रे !

कबीर एह प्रेम-मिलन आ भगति के समझावे खातिर संसारिक तरीका एही से चुनलन कि लोग ओके सहजे बूझी आ जानी, भलहीं एह संसारिक
तौर-तरीको में रहस-भेद छिपल रहे। उनका खातिर पुरुष त एकही बा – ऊ उनकर प्रिय-प्रियतम पिया। ऊ ओकर बहुरिया हउवन –

‘हरि मोरे पिउ मैं राम की बहुरिया’।

प्रेम के लौ लगवला के ई सबसे सुगम तरीका रहे। ऊ एही पिया के राह ताकसु, ओकरा प्रेम में मगन होखसु आ ओकरा बिरह में सुनुगस, जरस तड़पस –

बालम आवो हमारे गेह रे ।
तुम बिन दुखिया देह रे ।।
…. …. …. …. ….. …. …. ….
जाग पियारी अब ना सोवै।
रैन गई दिन काहे को खोवे ।।
…. …. …. …. ….. …. …. ….
अजब तरह का बना तमूरा तार लगै मन मात रे
खूंटा टूटी तार विलगाना कोऊ न पूछै बात रे
हँस हँस पूछो मात पिता सों, भोरें सासुर जाब रे
जो चाहै सो वो ही करिहै पत वाही के हाथ रे ।।
…. …. …. …. ….. …. …. ….
साँई के संग सासुर जाई
संग ना रही स्वाद ना जानी, क्यों जोबन सुपने की नाई ।
सखी-सहेली मंगल गावै, सुख-दुख माथे हरदी चढ़ाई ।।
भयो बियाह चली बिन दूलह बाट जात समधी समझाई ।।

लोकरंग, राग आ रीति के मुताबिक कबीर अपना प्रेम भगति के बखान कइलन बाकि एम्मे रहस्य रहे – बहुत झीना रहस्य – तनिकी धेयान दिहला पर बुझा जाए वाला। उनका ‘पिया मिलन’ के राह बहुत कठिन रहे। ऊपर से संसारिक माया मोह के भ्रमजाल। ऊ मिलन के आस लिहले घर से निकलि परलन –

अविनासी दुलहा क मिलिहौ भक्तन के रछपाल ।
जल उपजौ जल ही सों नेहा, रटत पियास पियास ।
मैं ठाढ़ी बिरहन मग जोऊँ प्रियतम तुम्हरी खास ।

मिलन के ई तड़प जस जस बढ़े शरीर चरखा हो जाय – ‘तन-मन रहँट अस डोले।’ एह बिरह-व्याकुलता आ संसारी-व्याकुलता के वर्णन कबीर लौकिक ढंग से कई कई बेरि कइले बाड़न –

तलफै बिन बालम मोर जिया ।
दिन नहिं चैन रात नहिं निंदिया
तलफ तलफ के भोर किया ।
तन मन मोर रहँट अस डोले
सून सेज पर जनम छिया ।

प्रियतम अगर छिनो भर खातिर भेंटा गइलन त कलावंत मेहरारू अस ऊ उनके बान्हे-रिझावे में लागि गइलन –

नैनों की करि कोठरी, पुतरी पलँग बिछाय
पलकन की चिक टारि के, पिय को लिया रिझाय ।
प्रीतम को पतिया लिखूँ जो कहुँ होय बिदेस
तन में मन में नैन में ताको कहा संदेस ।।
…. …. ….. …. …. ….
सूतल रहलूँ मैं नींद भरि हो, पिया दिहले जगाय ।
चरन-कँवल के अंजन हो, नैना ले लूँ लगाय ।
जासो निदिया न आयै हो नहि तन अलसाय ।
पिया के वचन प्रेम सागर हो चल चलीं हो नहाय ।

कबीर अपना भाव आ अनुभूति के व्यक्त करे खातिर भलहीं लौकिक शृंगारिकता के माध्यम बनवलन बाकिर उनकर उद्देश्य दोसर रहे। ऊ संसार में रहियो के संसारिक तौर तरीका से जवन बात कइलन ओमें गूढ़ दर्शन आ आध्यात्मिकता छिपल रहे। अपना ‘निरगुन’ पदन का जरिये ऊ लोक मानस में गहिरे पइठि गइल रहलन। अभिधा, लक्षणा, व्यंजना तीनू उनका काव्य भाषा में झलकेला। लोकरुढ़ियन आ मान्यता मिलल प्रतीकन के ऊ भरपूर प्रयोग कइले बाड़न। शब्द शक्तियन के इस्तेमाल में ऊ साइते चूकल होइहें। पाँच तत्व के चुनरी ऊहो नीरँग। पिय-मिलन खातिर जाए के बा आ ओहू में दाग परि गइल। का कहिहें ऊ? ई संसार अन्हार कोठरी – मनवो के मइल करे वाला पचड़ा से भरल। कबीर उकसावत बाड़न – मिलन में कवन लाज, कवन सँकोच, उनका से मिलते कूल्हि दाग छूटि जाई – कूल्हि अन्हार मेटि जाई –

अन्हियरवा में ठाढ़ गोरी का करेलू ?
जब लगि तेल दिया में बाती
येहि अँजोरवा बिछाय घलतू ।
संगहि अछत पिय भरम भुलइली
मोरे लेखे पिया परदेसहि रे की ।
…. ….. …. …. ….
मोरि चुनरी में परि गयो दाग पिया ।
पाँच तत्त की बनी चुनरिया
सोलह सै बंद लागे जिया ।
यह चुनरी मोरे मैंके तें आई,
ससुरा में मनुवाँ खोय दिया ।
…. ….. …. …. ….
तोरा हीरा हिराइल बा किचड़े में ।
कोई ढूँढे़ पूरब, कोई ढूंढ़े पच्छिम,
कोई ढूँढ़े पानी-पथरे में ।
दास कबीर ये हीरा को परखै
बाँध लिहले जियरा के अँचरे में ।
…. ….. …. …. ….
हमरी ननद निगोड़िन जागे ।
कुमति लकुटिया निसिदिन व्यापे,
सुमति देखि नहि भावै ।
…. ….. …. …. ….
कौन ठगवा नगरिया लूटल हो ।
चंदन काठ के बनल खटोलना
तापर दुलहिन सूतल हो ।

कबीर के निरगुन संसारिक छनभगंरुता के रहस भेद खोलि के अदिख साचँ सोझा रखि देला। उनकर सहज भाव भाषा में लिखल पद आजुओ गाँव देहात में लोग चाव से गावेला आ डूबि के सुनेला। कछु रूपक आ उलटवाँसियन के प्रयोग जरूर सामान्य लोगन का बस-बूता में ना रहल हालांकि ई प्रभाव ओह काल का हठयोगियन आ नाथ-सिद्धसंतन का सत्संगे के कारण कबीर पर परल बाकि कबीरदास प्रचलित रूपक आ प्रतीकन के प्रयोग कइला का साथे साथ अपने भाषा शब्दन के प्रयोग संकेत खातिर खुलि के कइलन. ई प्रचलित योग शास्त्रीय परम्परा में ना रहलन स। जइसे ‘मन’ के मच्छ, मीन, मतगं; ‘संसार’ के ‘वन’ सायर; ‘इन्द्रिय’ के सखी, सलेहरि; माया के डाइनि, ठगिनि, बिलैया, गैया, छेरी; ‘जीवात्मा’ के दुलहा, सिंह, पारथ, जोगी मूसा।

कबीर एगो अलगे ढंग के साधक रहलन – कूल्हि जोगपंथियन का प्रभाव का बावजूद ऊ सहज प्रेम-भगति के सहज-समाधि वाला राह पकड़लन। ओमे कवनो बाहरी आडम्बर आ बनावट ना रहे। ईहे सहज अवस्था उनका भाषा में समा गइल। एमें कवनो बनाव-सिंगार भा अलंकार करे के प्रयास नइखे। सुभाव से, अनसोहाते, अपन अनुभूति का शक्ति से ऊ ओह अकथ के कहि दिहलन, जेके बड़ बड़ लोग ओतना सहजता से ना कहि पावल। कबीर सही माने में भोजपुरी लोक आ भोजपुरी बोली-बानी के कवि रहलन।

ई सही बा कि उनका भाषा के शब्द, क्रियापद, कारक चिन्ह आदि खाँटी एकही भाषा के ना हउवन स – अवधी, ब्रजी, राजस्थानी, बिहारी (बनारस-गोरखपुर का ओर के) भोजपुरी आदि के क्रियापद, कारक चिन्ह आ शब्द उनका काव्यभाषा में मिलल बाड़न स – ओमे पंजाबी, फारसी के शब्दों बाड़न स, बाकिर हमरा समुझ से कबीर मूलरूप से ऊहे भाषा प्रयोग कइले बाड़ऩ जवन ऊ बचपन से बुढ़ापा ले अपना जीवन में बोललन – ई भाषा निछक्का भोजपुरी भलहीं मत कहाव बाकि ऊ कइहबे करी जवना प कछु पछाहीं छाँही परल होखेा। जइसे कवनो लोक भाषा के अलग-अलग खित्ता में अलगा-अलगा रूप मिलेला, ओही तरे कबीरो का समय में भोजपुरी में अलग-अलग खित्ता में भाषा व्यवहार होत होई। भाषा के ‘बहता नीर’ मानि के चले वाला कबीर एही बहता नीर में नहइले धोवले आ खइले-अँचवले रहलन। ‘बहता नीर’ जेने-जेने से बहत आवेला ओने ओने के रूप रस गंध, अच्छाई-बुराई ले ले आवेला. बाकि कुल्हि का बावजूद ऊ नैसर्गिक आ सुद्ध प्राकृतिक कहाला। कबीर एही प्राकृतिक बहता नीर के लोकरूप के अपना अनुभूति आ वाणी में धारण कइले रहलन। लोकज भाषा के एह महान सन्त आ ओकरा अमर वाणी के प्रणाम !

(‘जगरम’, (बक्सर) मार्च, 1997, अंक-9 में प्रकाशित।)


(भोजपुरी दिशाबोध के पत्रिका ‘पाती’ के जून 2019 अंक से साभार)

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