– शिलीमुख

हमहन का लोकतंत्र में अक्सर हुल्ल-हपाड़ मचत रहेला. ऊहो एकदम ठेठ अंदाज में. कबो संसद का भीतर त कबो बाहर. घोटाला, लूट आ भ्रष्टाचार पर कवनो साल बाँव (खाली) ना जाला. बलुक अब त हर चार-छव महीना में घोटाला के नये-नया रिकाड सोझा आ जाला. अइसना में तय बा कि विपक्षी राजनीतिक दल हाय-तोबा आ हंगामा मचइबे करिहन सऽ. आज के सत्ताधारी पार्टियो पहिले अइसहीं करत रहे – बलुक ऊ त कबो-कबो बेमसरफो हंगामा करे से ना चूके. सत्ताधारी पार्टी के कूल्हि पैंतरा मालूम बा .जब ऊ देखेले कि कवनो घोटाला के सोरि, ओकरा मेन लीडरे के ओरि जाता आ कूल्हि विपक्षी-दल एकवटि के हंगामा मचावत बाड़न सऽ, त ऊ ‘आरक्षण’ के एगो पुरान बिल संसद में पटक देले.

हुल्ल-हपाड़, हंगामा सार्थक होखे भा निरर्थक, ऊ लोकतंत्र के सुभाव में बा. हँ एक बात अउर बा – ई हुल्ल-हपाड़, विरोध आ हंगामा करे के अधिकार आम जनता के स्वयंभू नेतृत्व के नइखे. जइसे भ्रष्टाचार भा कालाधन पर कारवाई के लेके, भा लोकपाल बिल के लेके, संसद का बाहर अगर कवनो अन्ना-पार्टी भा रामदेव पार्टी अइबो करी त ओपर संसद में सवाल खड़ा हो जाई, ‘हुँ.ई कहां से आ गइलन, संसद के बतावे ? ई हउवन के ?’ राजनीतिक पार्टी मिलके ई सवाल दाग दी कि ‘ई त संसद का अधिकारे पर चुनौती देता, दबाव बनावऽता.’ कहे के मतलब ई कि हमहन के लोकतंत्र में ई हंगामा चलत रहेला आ सरकारो चलत रहेले. कबो-कबो चैनलिया ब्रेक लेख, मराठी-बिहारी के हंगामा, कबो असमिया बोडो के हंगामा आ कबो एह हंगामा का विरोध में मुम्बइया हंगामा. हमहन का देश के लोकतंत्र के इहे सब शोभा हऽ.

चुनाव का पहिले एक चिटुकी सुविधा, एक पसर असरा आ खुशहाल भविष्य के एक नीन सपना पर रीझे वाला साधारन लोग चुनाव का बेरा बहकि जाला. कुशासन, अव्यवस्था, महंगाई, भ्रष्टाचार, घोटाला आ छल-छहन्तर पर भीतर के उपजल खीस आ किरोध ओघरी भुला जाला. अगर हमहन का देश में आम जन माने, आम वोटर के ईहे हाल रही त कवनो राजनीतिक दल, कबो सबक ना सिखिहें सऽ.

सरकार ई कूल्हि देखेले आ महटियाइ के आपन काम करत रहेले, काम करत-करत ‘मनमानी’ के अछरंग लागेला, सहजोग करे वाली पाटी पिनिक जाले, सरकार समझावेले.. ‘मनिहें त मनिहें ना त जासु. अरे ऊ सरकारे का, जवन कुछ मनमानी ना करे.बन्हुआ थोरे हऽ सरकार.’ जनता काँखेले, कहंरेले — कबो महंगाई का दाब से, कबो असुरक्षा का दाब से, कबो पुलिसिया दाब से.. जनता पर मुसीबत आ दुख-बीपत आवते रहेला. दइबे ओकरा पर टेढ़ रहेलें. कबो सूखा आई कबो बाढ़, कबो बादर फाटी कबो धरती धंसी…. ई सब चलत. ई सब चलत रहेला आ ‘लोक’ के तंत्र आपन काम करत रहेला. जनता के कहंरला, पर सरकार पुछार जरूर करेले, कुछ ना त संवेदना, आश्वासन त देबे करेले. महंगाइयो पर लगाम लगावे के सरकारी-चिन्ता से सभ वाकिफ बा. महंगाई रूके त कइसे? ससुरी कबो पेट्रोल, कबो डीजल, कबो बिजुली, आ रसोई गैस के बढ़ल दाम पी के अस छतिया जाले कि जनता का छाती पर चढ़ बइठेले. सरकारो जानेले कि जनता के धेयान भटकावे के कई गो नया बहाना बा. कुछ ना मिली त अगड़ा, पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक, आतंकवाद, आरक्षण, घुसपैठ में से कवनो मुद्दा उछाल दियाई. पचासन बरिस से हमनी किहां इहे होत आइल बा आ हमनी का—(माने आम जनता) ई सब देखत-सुनत-सहत आइल बानी जा.

हमहन का लोकतंत्र में आम लोग ऊ ‘वोटर’ हऽ, जवन बहुत कुछ देखियो-समझि के ना समझे. अफवाह आ उसुकवला पर ई वोटर ऊ सब क ‘घाली जवन ना करे के चाही, बाकि वाजिब बात पर आवाज निकाले के जगहा, मुहँवे बन्द क’ ली. वोटर कहाये वाला ई लोग कूलि दुख, अपमान, अनेति, असुरक्षा, बदहाली आ महंगाई झेली आ चुनाव में, अदबदाइ के आपन वोट, ओही पाटी के दे देई, जे एकरा खतिर जिम्मेदार बा. जात, मजहब आ भाषा का नांव पर बंटाए वाला वोटर ‘भ्रष्टाचार’ अत्याचार सब भुला जाला. अपना छोट आ छुद्र स्वारथ में— कुछ रूपया, कुछ कपड़ा, आवास, नोकरी का लालच में बहक जाला. कबो कर्जमाफी कबो बेरोजगारी भत्ता आ लैपटाप खातिर आपन भविष्य दॉंव पर लगा देला.

एह ‘वोटर’ नांव के आम जनता का पास न सुविधन सड़क बा, न सुविधन बिजली-पानी, न लड़िकन के पढ़ावे लिखवे के इस्कूल बा न अस्पताल बा, आ जहवां बा, ओइजा जाए खातिर रुपया चाहीं. ऊ पलिवार क खेवा-खर्चा चलवले में तंग बा. एही में अगर कवनो दैबी परिस्थिति, दुर्घटना आ बेमारी हो गइल त घर-दुआर, खेत-बगइचा पोसल पालल पसु-चउवा तक बिका जाई. गंवई सूदखोर अलगे ताक में बइठल मिलिहन सऽ. कहे क मतलब ई कि सरकार का मनमानी आ अनेत पर, केंकियाए-चिचियाये तक के बेंवत आ हिम्मत ओकरा पास नइखे आ जेकरा लगे बा, ओकरा अपने से फुर्सत नइखे.

अब सरकार विदेशी पूंजी का जरिये विकास का नाँव पर कड़ा आ लोकविरोधी फैसला लेत खा ई नइखे सोचत कि एकर नतीजा उल्टो हो सकेला. एकर कारन इहे बा कि ओकरा पाछा, विरोध करे वाला बहुत लोगन क दबल-छुपल समर्थन आ सहमति बा. बिरोधी कहाये वाला कुछ लोग हर हाल में, ओकरे साथ आई. मौका देख के ‘डील’ करे वाला राजनीतिक दल आ सांसद, सरकार का संगे खड़ा बाड़न. लोग जियो चाहे मुओ, चाहे एक-एक चीजु खातिर तरसो, बदहाली का कगारे पर ना पहुँच जाव, ए कूल्हि से, एह दल आ नेता लोगन के कवनो मतलब नइखे. जनता के देखावे आ भरमावे वाला चेहरा अउर बा आ मौका ताड़ के फायदा कमाए वाली नीति अउर बा. जनता त जनता हऽ ओके समझा दियाई कि ‘सम्प्रदायिकता’ के रोके खतिर ई कूल्हि घोटाला, भ्रष्टाचार, महंगाई आ जनविरोधी फैसला मंजूर बा. साधारन लोग, भला ई छल-छहंतर आ राजनीतिक पैंतरा का बूझी ? बुझिये के का करी ? जबाब ना दीही. इयादो राखी त, वोट आवत आवत भुला जाई.. नतीजा, फेरू बैतलवा डाल पर.
( क्रमशः.पाती के अगिला अंक में)


ई लेख भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका पाती” के सितम्बर २०१२ अंक में प्रकाशित भइल बा.

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