सत्य आ धर्म का पालन के व्रत- ‘बहुरा’

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डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल

भादो महीना के अन्हरिया के चौथ के बहुरा कहल जाला.कहीं-कहीं एकरा के गाइ माई के पूजा के परब मानल जाला.गाइ आपन दूध पियाके आदिमी के पालेले आ पोसेले,हमनियो के कृतज्ञ होके गाइ के  सम्मान करेके चाहीं, पूजेके चाहीं.ओइसे, हम एकरा के सत्य आउर धर्म का पालन के व्रत मानींले.एह अवसर पर गाइ आ बाघ के माटी के मूर्ति बनाकर पूजन करे के विधान प्रचलित बा.

एह दिन माई-बहिन अपना संतान के रक्षा खातिर व्रत राखेलिन. कहीं-कहीं कुँआर लइकी ई व्रत करेली सन.अइसन साइत एहसे कि माई का सत्य व्रत में अपना जान के मोह ना राखेवाला बछरुओ बाघ का सोझा गइल रहे.एह दिन व्रती पूरा दिन उपासे रहेलिन.

एह दिन खास करके गाइ का दूध पर खाली बछरू के अधिकार मानल जाला.एही से गाइ का दूध से बनल कवनो चीज एह दिन ना खाएके चाहीं.आज उपासे रहिके गाइ, बछरू आ बाघ के माटी के मूर्ति बनाके पूजा कइल जाला.एह व्रत में बाघ बनिके गाइ के परीक्षा लेबेवाला भगवान कृष्ण के कथा सुनल जाला.बहुरा का दिन गऽहूँ आ चाउर से बनल चीज ना खाइल जाला.हमनी किहाँ जौ के सातू(सतुआ) के भोग लगावल जाला आ बाद में ऊहे गुर(गुड़) का सङे खाके पारन कइल जाला.

‘बहुरा’ (चउथि) व्रत के कथा

कहल जाला कि कवनो ब्राह्मण का घर में एगो गाइ रहे.गइया के एगो बछरू रहे.गइया के जब साँझि खा घरे लवटे में देर हो जाए त ओकर बछरुआ बेआकुल हो जात रहे.एक दिन गइया घास चरत-चरत अपना झुंड से बिछुड़ गइलि आ जंगल में बहुत दूर निकल गइलि.अचानक ओकरा सोझा एगो खूँखार बाघ आ गइल.बघवा गइया प झपट्टा मरलसि.तब गइया ओकरासे विनती करे लागलि.कहलसि कि ओकर बछरुआ भोरहीं से ओकर राह ताकत होई.हम ओकराके दूध पियाके लवटि आइबि,तब रउँआ हमराके खाके आपन भूखि मेटा लेबि.बघवा के गाइ प विश्वास ना रहे कि ऊ लवटिके आई.तब गइया सत्य आ धर्म के किरिया खइलसि आ बाघ राजा के लवटिके आवेके विश्वास दियवलसि.बघवा ओकराके अपना बछरू जरे जाए दिहलसि.गइया तेजी में घर पहुँलि,अपना बछरू के जल्दी में दूध पियवलसि आ खूबे चुमलसि-चटलसि.बछरुआ माई के सहमल-सहमल आ चिंतित रूप के भाँप गइल रहे.ओकरा ढेर हठ कइला पर गइया ओकराके सभ बता दिहलसि.ओकरा बाद आपन बचन पूरा करे खातिर बाघ राजा का सोझा गइया अकेले ना गइलि बछरुओ साथे रहे.बघवा ई देखिके बहुते हैरान भइल.ऊ गाइ का बचन का सोझा आपन माथा नववलसि आउर खुशी-खुशी गाइ के अपना घर जाए दिहलसि.कहल जाला कि बाघ का रूप में भगवान श्रीकृष्ण गइया के कि सत्य आ धर्म के परीक्षा लेत रहन.तबे से ‘बहुरा’ के व्रत राखे के परंपरा चलल आ रहल बिया.

व्रत के नामकरण

कहीं-कहीं त प्रचलित बा कि ओह गइया के नाँव ‘बहुरा’ रहे.कहीं-कहीं प्रचलित बा कि ऊ गइया वृंदावन के ‘बहुरा’ बन में रहत रहे,एही से एह परब के नाँव ‘बहुरा’ परल.बाकिर हमरा त ई लागेला कि सत्य आ अपना धर्म पर रहला का कारन गाइ के दिन बहुरल (फेरु से लवटल),एही से एह परब के नाँव ‘बहुरा’ परल.

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3 Comments on "सत्य आ धर्म का पालन के व्रत- ‘बहुरा’"

  1. सुनर संस्कृति के एगो अध्याय। जय हो..

  2. सर,
    रउआ सही कहनी कि गईया के बाघ के चंगूल से छूटे के करण उ बहुरा कहल जाला। कहावतो बा बहुराईल माने दिन फिरल।
    बचपन में माई से ई कहानी सुनले रहनी पर ई मालूम न रहे कि आज के दिन परब के रुप में मनावल जाला।
    ई नया ज्ञान देवे खातिर राउर धन्यवाद।

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