– डा. अशोक द्विवेदी गँवई लोक में पलल-बढ़ल मनई, अगर तनिको संवेदनशील होई आ हृदय-संबाद के मरम बूझे वाला होई, त अपना लोक के स्वर का नेह-नाता आ हिरऊ -भाव के समझ लेई. आज काकी का मुँहें एगो जानल-सुनल पुरान गीत सुनत खा हम एगो दोसरे लोक में पहुँच गउंवीं.पूरा पढ़ीं…

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– डा. अशोक द्विवेदी छोट घर-बार में हमहन क, अब समाव कहाँ नेह ऊ बा कहाँ अपनन में, ऊ लगाव कहाँ जीउ टेघरे लगे गैरन के लोर चुवला पर अब भला गाँव के लैनू नियर सुभाव कहाँ बा खनक दाम के, अइँठन बा कुछ कमइला के यार पहिले नियर उपूरा पढ़ीं…

– डा. अशोक द्विवेदी बाहुबलियन से चलत बा काम जब सरकार के का सुनी, केहू भला कमजोर के, लाचार के ! हर खबर में बा मसाला, पढ़ीं चाहे, मत पढ़ीं टाट पर मखमल चढ़ावल काम बा अखबार के ! पुर्जा-पुर्जा नोचि के ड्राइवर-खलासी ले उड़ल बात गाड़ी के करीं, अबपूरा पढ़ीं…

– डा0 अशोक द्विवेदी सबुर धरीं कबले , हमहन के मत कंगाल करीं साठ बरिस किरसवनी/ अब मत जीयल काल करीं ! नोच -चोंथ के खा गइनी सब / कुछऊ ना बाँचल डर से रउरा पटा गइल सब ,बूझल ना जाँचल पिन्ड छोड़ दीं अब्बो से; मत अँखिया लाल करींपूरा पढ़ीं…

– डाॅ. अशोक द्विवेदी रतिया झरेले जलबुनिया फजीरे बनि झालर झरे फेरु उतरेले भुइंयाँ किरिनियाँ सरेहिया में मोती चरे ! सुति उठि दउरेले नन्हकी उघारे गोड़े दादी धरे बुला एही रे नेहे हरसिंगरवा दुअरवा प’ रोजे झरे बुची चुनि-चुनि बीनेले फूल आ हँसि हँसि अँजुरी भरे; जब उतरेले भुइयाँ किरिनियाँपूरा पढ़ीं…

– डा0 अशोक द्विवेदी सुतल बा जागि के जे, ओके का जगइबऽ तूँ ? घीव गोंइठा में भला कतना ले सुखइबऽ तूँ ? बनल बा बेंग इहाँ कतने लोग कुइंयाँ के नदी, तलाब, समुन्दर के, का देखइबऽ तूँ । बा जरतपन के आगि पेट में सुनुगत कबसे उ अगर लहकपूरा पढ़ीं…

– डा0 अशोक द्विवेदी हुक्मरानन का खुशी पर फेरु मिट जाई समाज अपना अपना घर का आगा, खोन ली खाई समाज । कर चुकल बा आदमी तय सफर लाखन कोस के घूम फिर के कुछ समय में, का उहें आई समाज ? जुल्म से भा जबरजस्ती ना बसे बस्ती कहींपूरा पढ़ीं…

– डा0 अशोक द्विवेदी एह बेशरम-अनेति पर अउँजा के, का लिखीं उरुवा लिखीं, उजबक लिखीं कि बेहया लिखीं लंपट आ नीच लोग बा इहवाँ गिरोहबन्द सोझबक शरीफ के बा बहुत दुरदसा लिखीं लँगटे-उघार देहि से, दिल से दिमाग से अइसनका लोग ढेर बा,अब कतना, का लिखीं एह देश के कहियापूरा पढ़ीं…

– डा॰ अशोक द्विवेदी ‘लोक’ के बतिये निराली बा, आदर-निरादर, उपेक्षा-तिरस्कार सब के व्यक्त करे क ‘टोन’ आ तरीका अलगा बा. हम काल्हु अपना एगो मित्र किहाँ गइल रहलीं, उहाँ दुइये दिन पहिले उनकर माई उनका गाँव आरा (बिहार) से आइल रहुवी. पलग्गी आ हाल चाल का बाद अनासो हमरापूरा पढ़ीं…

– डा0 अशोक द्विवेदी नेह-छोह रस-पागल बोली उड़ल गाँव के हँसी-ठिठोली. घर- घर मंगल बाँटे वाली कहाँ गइल चिरइन के बोली. सुधियन में अजिया उभरेली जतने मयगर, ओतने भोली. दइब क लीला-दीठि निराली दुख- सुख खेलें आँख मिचोली. हिलल पात, पीपर-मन डोलल पुरुवा रुकल त, पछुवा डोली. आपन-आपन महता बाटेपूरा पढ़ीं…

– डा0 अशोक द्विवेदी कुछ नया कुछ पुरान घाव रही तहरा खातिर नया चुनाव रही । रेवड़ी चीन्हि के , बँटात रही आँख में जबले भेद-भाव रही । अन्न- धन से भरी कहीं कोठिला छोट मनई बदे अभाव रही । भाव हर चीज के रही बेभाव जबले हमनी के ईपूरा पढ़ीं…