– डा॰ अशोक द्विवेदी गंगा नदी पार होत-होत अँजोरिया रात अधिया गइल रहे. दुख आ पीरा क भाव अबले ओ लोगन का चेहरा प’ साफ-साफ देखल जा सकत रहे. छछात मृत्यु का सामने से, सुरक्षित लवटि आइल साधारन बात ना रहे. संजोग अच्छा रहे कि असमय आ अकाल आवे वालापूरा पढ़ीं…

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दुर्गम बन पहाड़न का ऊँच-खाल में जिए वाला आदिवासी समाज के सहजता, खुलापन आ बेलाग बेवहार के गँवारू, जंगलीपना भा असभ्यता मानेवाला सभ्य-शिक्षित समृद्ध समाज ओहके शुरुवे से बरोबरी के दरजा ना दिहलस. समय परला पर ओकर उपयोग जरूर कइलस. खुद क उपजावल असंगति आ अन्तर्विरोध क शिकार सभ्य शिक्षितपूरा पढ़ीं…

– अशोक द्विवेदी उहो बजावे ले एकतारा ! तुलसी, सूर प’ मूड़ी झाँटसु ले कबीर के नाँव, सरापसु भदभाव के टाफी चाभत कबिता कहनी लीखसु नारा ! उहो बजावे ले एकतारा ! पढ़सु फारसी, बेचस हिन्दी उर्दू में अंगरेजी बिन्दी अनचितले जब तब चिहाइ के नापसु भोजपुरी के पारा !पूरा पढ़ीं…

– डा॰अशोक द्विवेदी दूबि से निकहन चउँरल जगत वाला एगो इनार रहे छोटक राय का दुआर पर. ओकरा पुरुब, थोरिके दूर पर एगो घन बँसवारि रहे. तनिके दक्खिन एगो नीबि के छोट फेंड़ रहे. ओही जा ऊखि पेरे वाला कल रहे आ दू गो बड़-बड़ चूल्हि. दुनों पर करहा चढ़लपूरा पढ़ीं…

(रामझरोखा से) – डा॰अशोक द्विवेदी अइसे त देस जगले रहेला बकि जगलो में सूलत लेखा लागेला. एक से एक बड़, भयानक आ अमानवी दुर्घटना-घटना घटत रहेला आ ओकरा दिल-दिमाग प चिचिरी ना खींचि पावेला. अइसना में देस के सूतल, निनियाइल आ महँटियावत “सिस्टम” बस खाना पूर्ति करत रहेला. एह तरहपूरा पढ़ीं…

– डा॰अशोक द्विवेदी भाई का डंटला आ झिरिकला से गंगाजी के सिवान छूटल त बीरा बेचैन होके अनासो गांव चौगोठत फिरसु. एने ओने डँउड़िआइ के बगइचा में फेंड़ा तर बइठि जासु आ सोचल करसु. सोचसु का, खाली उड़सु. कल्पना का महाकाश में बिना सोचल-समझल उड़सु. एह उड़ान में कब पाछापूरा पढ़ीं…

(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से आखिरी प्रस्तुति) – डा॰अशोक द्विवेदी धुन से सुनगुन मिलल बा भँवरन के रंग सातों खिलल तितलियन के लौट आइल चहक, चिरइयन के! फिर बगइचन के मन, मोजरियाइल अउर फसलन के देह गदराइल बन हँसल नदिया के कछार हँसल दिन तनी, अउर तनीपूरा पढ़ीं…

– डा॰अशोक द्विवेदी कोइलरि कूहे अधिरतिया आ बैरी चइत कुहुँकावे. रहि रहि पाछिल बतिया इ बैरी चइत उसुकावे. कुरुई-भरल-रस-महुवा, निझाइल कसक-कचोटत मन मेहराइल उपरा से कतना सँसतिया, आ बैरी चइत कुहुँकावे. फगुवा गइल दिन कटिया के आइल अइले ना उहो, खरिहनवा छिलाइल कब मिली उहाँ फुरसतिया, इ बैरी चइत कुहुँकावे.पूरा पढ़ीं…

पिछला दिने पहली फरवरी के मुंबई में भोजपुरी के एगो खास काव्य संध्या के आयोजन भइल. खास एह माने में कि मराठी भाषी प्रबुद्ध लोग के मानस के मर्म छू लिहलसि भोजपुरी कविता. आयोजन करवले रहल सामाजिक सांस्कृतिक संस्था “सेतु” आ जगहा रहे पश्चिमी मुंबई के रोटरी क्लब हॉल. एहपूरा पढ़ीं…

– डा॰अशोक द्विवेदी रतिया झरेले जलबुनिया फजीरे बनि झालर, झरे फेरु उतरले भुइयाँ किरिनिया सरेहिया में मोती चरे ! सिहरेला तन, मन बिहरे बेयरिया से पात हिले रात सितिया नहाइल कलियन क, रहि-रहि ओठ खुले फेरू पंखुरिन अँटकल पनिया चुवत खानी दिप्-दिप् बरे ! चह-चह चहकत/चिरइयन से सगरो जवार जगेपूरा पढ़ीं…

– डा॰अशोक द्विवेदी हम तोहके कइसे लिखीं? कइसे लिखीं कि बहुते खुश बानी इहाँ हम होके बिलग तोहन लोग से… हर घड़ी छेदत-बीन्हत रहेला इहवों हमके गाँव इयाद परावत रहेला हर घड़ी ओइजा के बेबस छछनत जिन्दगी. कल कहाँ बा बेकल मन के एहूजा? हम ई सब लिखि के नइखींपूरा पढ़ीं…