– कामता प्रसाद ओझा ‘दिव्य’ अन्हरिया….. घोर अन्हरिया…. भादो के अन्हरिया राति. छपनो कोटि बरखा जइसे सरग में छेद हो गइल होखे. कबहीं कबहीं कड़कड़ा के चमकि जाता त बुझाता जे अबकी पहाड़ के छाती जरूरे दरकि जाई. मातल पिअक्कड़ अस झूमि झूमि अन्हड़, गाछ-बिरिछि पर आपन मूँड़ी पटकत बा.पूरा पढ़ीं…

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