– ओ. पी. सिंह हर बेर जब बतंगड़ लिखे बइठिलें त मन में कवनो ना कवनो खाका बन चुकल रहेला आ बाति पर बाति निकलत जाले आ बतंगड़ई पूरा हो जाले. बाकिर पता ना काहे आजु मन बेचैन बा. कई बेर श्रीमती जी टोकबो करेली कि का रात दिन कंपूटरवापूरा पढ़ीं…

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