– केशव मोहन पाण्डेय एगो किताब के भूमिका में रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव ऊर्फ जुगानी भाई लिखले बाड़े कि ‘भाषा आ भोजन के सवाल एक-दोसरा से हमेशा जुड़ल रहेला. जवने जगही क भाषा गरीब हो जाले, अपनहीं लोग के आँखि में हीन हो जाले, ओह क लोग हीन आ गरीब हो जालंऽ.’ ओही के झरोखा से देखतपूरा पढ़ीं…

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“पूर्वांचल के माटी उर्वर हटे.एहिजा के लोग दिल्ली का, कतहीं अपना मेहनत से मिट्टी के सोना बना देलन.” ई बात रविवार, दिनांक 25 जून के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में भोजपुरी समाज, दिल्ली द्वारा सम्मान समारोह का अवसर पर सांसद आ दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष मनोज तिवारी कहलें. ऊ जनता कापूरा पढ़ीं…

– केशव मोहन पाण्डेय जनम लिहले कन्हैया कि बाजेला बधाईया अँगनवा-दुअरिया नू हो। अरे माई, दुआरा पर नाचेला पँवरिया कि अइले दुखहरिया नू हो।। बिहसे ला सकल जहान कि अइले भगवान कि होई अब बिहान नू हो। अरे माई, हियरा में असरा बा जागल झुमेला नगरिया नू हो।। गरजि-चमकि मेघपूरा पढ़ीं…

– केशव मोहन पाण्डेय जइसे दूध-दही ढोवे सबके सेहत के चिंता करे वाला गाँव के ग्वालिन हऽ गौरैया एक-एक फूल के चिन्हें वाला मालिन हऽ। अँचरा के खोंइछा ह विदाई के बयना हऽ अधर के मुस्कान ह लोर भरल नैना हऽ। चूडि़हारिन जस सबके घर के खबर राखेले डेहरी भरीपूरा पढ़ीं…

– ओमप्रकाश अमृतांशु कला-साहित्य कवनो भाषा में होखे ओकर महत्व सबसे उपर होखेला. साहित्य समाज के रास्ता देखावेला, अपना साथे लेके चलेला आ अपना संस्कृति के पहिचान करावेला. साहित्य के बाग-फुलवारी जेतने हरियर, कंचन-कचनार रही समाज ओतने पलत-बढ़त, फरत-फुलात आ टह-टह-टहकार रही. साहित्य कवनो जाति-समप्रदाय, गरीब-अमीर के थाती ना हउए.पूरा पढ़ीं…

– केशव मोहन पाण्डेय जमाना बदलऽता, एकर लछन शहर से दूर गाँवो-देहात में लउकऽता. अब ठेंपों छाप लोग के बात-व्यवहार में जमाना के नवका रूप झलकेला. सुन्नर बाबा ढेर पढ़ले ना रहले, बाकीर ऊ करीकी अक्षर के भँइस ना समुझस. पतरा-पोथी के अक्षर-खेल बुझाऽ जाव. सतनारायन भगवान के कथा ईयादपूरा पढ़ीं…

– केशव मोहन पाण्डेय जोन्हिया काकी पता ना केतना दिन के भइली कि टोला भर के सभे काकीए कहेला. ऊ अपना टूटही पलानी में अकेले अपना बाकी जिनगी से ताल ठोंकेली. उनकर पूत पुरन नवका दुनिया के निकललन. दू-तीन बार पंजाब कमाए गइल रहलन से उनका साथे उनके मलिकाइन शोभोपूरा पढ़ीं…

– केशव मोहन पाण्डेय 1. गीत महुआ मन महँकावे, पपीहा गीत सुनावे, भौंरा रोजो आवे लागल अंगनवा में। कवन टोना कइलू अपना नयनवा से।। पुरुवा गावे लाचारी, चिहुके अमवा के बारी, बेरा बढ़-बढ़ के बोले, मन एने-ओने डोले, सिहरे सगरो सिवनवा शरमवा से।। अचके बढ़ जाला चाल, सपना सजेला बेहाल,पूरा पढ़ीं…

– केशव मोहन पाण्डेय दहशत के किस्सा त दर्दनाक होइबे करी। ग़म के दौर में ख़ुशी इत्तेफाक होइबे करी।। माचिस के तिल्ली कबले खैर मनाई आपन, जरावल काम बा त खुद खाक होइबे करी।। जेकर काम होखे भरम उतारल चौराहा पर, ओकरो बदन पर कौनो पोशाक होइबे करी।। जवान बिटियापूरा पढ़ीं…

– केशव मोहन पाण्डेय 1. ग़ज़ल एतना नीचे ना गिरऽ कि शरम छोड़ द, हार आ जीत के कुछ भरम छोड़ द. वसूल जिनगी के सबके अलग होखेला, ऊ मुहब्बत छोड़ें, तू हरम छोड़ द. दरिया काग़ज़ के कश्ती से डरबे करी, शर्त, अइसन कुछ आपन करम छोड़ द. जेकरापूरा पढ़ीं…

– केशव मोहन पाण्डेय (1) ग़ज़ल खुशहाल जिनगी भी जहर हो जाला। दिल के दुआ जब बेअसर हो जाला।। लाख जतन कइला पर भी मिले ना मंजिल, डगमगात कदम जब कुडगर हो जाला।। सुन्न अंखियन से छलक जाला समुन्दर, हिया में याद के जब कहर हो जाला।। झोहे केतनो अन्हरियापूरा पढ़ीं…