– अशोक द्विवेदी आपन भाषा आपन गाँव, सुबहित मिलल न अबले ठाँव । दउरत-हाँफत,जरत घाम में, जोहीं रोज पसर भर छाँव । जिनिगी जुआ भइल शकुनी के, हम्हीं जुधिष्ठिर, हारीं दाँव । कमरी ओढ़ले लोग मिलत बा केकर केकर लीहीं नाँव । जरलो पर बा अँइठन एतना, सब अमीर ,पूरा पढ़ीं…

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– रामरक्षा मिश्र विमल शहर में घीव के दीया बराता रोज कुछ दिन से सपन के धान आ गेहूँ बोआता रोज कुछ दिन से जहाँ सूई ढुकल ना खूब हुमचल लोग बरिसन ले उहाँ जबरन ढुकावल फार जाता रोज कुछ दिन से छिहत्तर बेर जुठियवलसि बकरिया पोखरा के जल गतेपूरा पढ़ीं…

– डा0 अशोक द्विवेदी कुछ नया कुछ पुरान घाव रही तहरा खातिर नया चुनाव रही । रेवड़ी चीन्हि के , बँटात रही आँख में जबले भेद-भाव रही । अन्न- धन से भरी कहीं कोठिला छोट मनई बदे अभाव रही । भाव हर चीज के रही बेभाव जबले हमनी के ईपूरा पढ़ीं…

– ऋतुराज (1) चाननी जइसन रूपवा के तोड़ नइखे भोर, भोर हो गइल ऊ अॅंजोर नइखे. चुप कराईं त आउर ज़ोर से बाजे तोहरा पायल सन केहू मुँहजोड़ नइखे. तोहरा पाछे बहुत बा हमें ठोक लऽ हमरा हीया के पिरितिया के जोड़ नइखे. होई हमर किसानी तोहरा चढ़ी सोना-चानी हमरापूरा पढ़ीं…

-आसिफ रोहतासवी (एक) फेड़न के औकात बताई कहियो अइसन आन्ही आई. घामा पर हक इनको बाटे पियराइल दुबियो हरियाई. पाँव जरे चाहे तरुवाए चलहीं से नू राह ओराई. मोल, चलवले के बा जांगर रामभरोसे ना फरियाई. नाहीं कबरी बिन हिलसवले दिन-पर-दिन आउर जरियाई. अपना खातिर चउकन्ना बा तहरा बेर बहिरपूरा पढ़ीं…

-आसिफ रोहतासवी अब ना बाँची जान बुझाता बाबूजी लोग भइल हैवान बुझाता बाबूजी पढ़ल लिखल हमनी के सब गुरमाटी बा उनका वेद कुरान बुझाता बाबूजी आपुस में टंसन बा फिर हमरा गाँवे खेत जरी, खरिहान बुझाता बाबूजी बबुआ तऽ अबहींए आँख तरेरऽता एक दिन बनी महान बुझाता बाबूजी सटलीं पेवनपूरा पढ़ीं…

(1) छलकत तलफत नजर, त बरबस गजल भइल. लहसल लहकत दहर, त बरबस गजल भइल. अद बद पनघट पर जब परबत पसर गइल, सइ-सइ लहरल लहर, त बरबस गजल भइल. चटकल दरपन चमकल दहक-सहक बन-बन, समय गइल जब ठहर, त बरबस गजल भइल. अलकन पर, मद भरल नयन, मनहर तनपूरा पढ़ीं…

– मनोज भावुक वक्त के ताप सहहीं के बाटे बर्फ से भाप बनहीं के बाटे पाप के केतनो तोपी या ढ़ाँपी एक दिन ओकरा फरहीं के बाटे जवना ‘घर’ में विभीषण जी बानी ओह लंका के जरहीं के बाटे चाँद-सूरज बने के जो मन बा तब त गरहन के सहहींपूरा पढ़ीं…

– मनोज भावुक जिनगी भूलभुलइया हम हेरा जातानी. गलती उनकर बाटे हम घेरा जातानी. उ सरवा निर्लज्ज ह हम डेरा जातानी. ताकत होइहें पत्नी हम डेरा जातानी. हम कोल्हू के गन्ना हम पेरा जातानी. क्रोघ अम्ल हs ‘भावुक’ हम सेरा जातानी.

– केशव मोहन पाण्डेय दहशत के किस्सा त दर्दनाक होइबे करी। ग़म के दौर में ख़ुशी इत्तेफाक होइबे करी।। माचिस के तिल्ली कबले खैर मनाई आपन, जरावल काम बा त खुद खाक होइबे करी।। जेकर काम होखे भरम उतारल चौराहा पर, ओकरो बदन पर कौनो पोशाक होइबे करी।। जवान बिटियापूरा पढ़ीं…

– रामरक्षा मिश्र विमल 1 शहर में घीव के दीया जराता रोज कुछ दिन से सपन के धान आ गेहूँ बोआता जोग कुछ दिन से जहाँ सूई ढुकल ना खूब हुमचल लोग बरिसन ले ढुकावल जात बाटे फार ओहिजा रोज कुछ दिन से छिहत्तर बेर जुठियवलसि बकरिया पोखरा के जलपूरा पढ़ीं…