– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’ भाषिक, सांस्कृतिक आ बौद्धिक गुलामी एतना ना मेहीं (बारीक) चीज ह कि एकरा गुलाम का पतो ना चले कि ऊ एह सबके कब से गुलाम बा. ई गुलामी ओकरा उपलब्धि जइसन महसूस होला. ओकरा आगे भाषिक अस्मिताबोध के बात कइनी कि ऊ तपाक से बोलीपूरा पढ़ीं…

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– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’ वैदिककाल होखे भा पौराणिककाल, ऐतिहासिक काल होखे भा आधुनिक काल, भोजपुरी भाषी जनसमुदाय राष्ट्र अउर राष्ट्र के भाषा-संस्कृति, सम्मान-स्वाभिमान आ उत्थान-पहचान खातिर कवनो तरह के बलिदान देवे खातिर हर घरी हर छन तत्पर रहल बा. आजादी के लड़ाई के दरम्यान भोजपुरी समाज देश के एकतापूरा पढ़ीं…

– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’ भारतीय संविधान के आठवीं अनुसूची में मौजूद बाइसो भारतीय भा गैर भारतीय भाषा सब में हिन्दी, उर्दू आ संस्कृत पर आगे चर्चा होई. बाकी अनइसो भाषा के विषय में पहिले जानल जादे जरूरी बा. असमिया भाषा मुख्य रुप से असम प्रांत के भाषा हिअ. जवनपूरा पढ़ीं…

– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’ बिहार में विधानसभा के चुनावी बिगुल फूँका गइल बा. भीड़भाड़ का चलते मतदान केंद्र पर अपना मताधिकार के प्रयोग से भरसक बाँचे के प्रयास करे वाला तथाकथित बुद्धिभोगी जमात आज-काल्ह चुनाव के लेके खूब गपिया रहल बाड़ें. अपना के हर राजनीतिक दल नेता से निरपेक्षपूरा पढ़ीं…

– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’ रबीस जापान में कम्प्यूटर इंजीनियरिंग के पद पर काम करत रहस. उनका उहँवा एगो जापानी लइकी से नेह-सनेह बढ़ल आ एक दिन दूनो जने बिआह के बन्हन में बन्हा गइल लोग. लइकियो एगो बड़ दूध डेयरी कम्पनी के हाकिम रहे. दूनो जिनगी सुख-चैन से कटेपूरा पढ़ीं…

– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’ ‘अस्मिताबोध’ ओह सग्यानी-स्वाभिमान का होला, जेकरा दिल-दिमाग आ मन-मिजाज में अपना आ अपना पुरखन का उपलब्धियन के लेके मान-गुमान के भाव होखे. एकरा खातिर देश-काल-परिस्थिति के अनुकूल-अनुरूप देशज संस्कार-संस्कृति से ओह मनई के नाभि-नाल संबंध आ सरोकार के दरकार होला. ई सभका ला सहज-सुलभ नापूरा पढ़ीं…

– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’ जेठ भाई के निहोरा करऽ जन अनेत नेत, बबुआ सुधारऽ सुनऽ, तूँही ना ई कहऽ काहे होला रोजे रगड़ा । आपन कमालऽ खालऽ, एनहूँ बा उहे हालऽ आर ना डरेड़ फेर, काहे ला ई झगड़ा ।। चूल्हे नू बँटाला कहीं, इज्जतो बँटाला बोलऽ, ओठ सीपूरा पढ़ीं…

चलि गइल छोड़ि कवन देसवा हो बाबू, मिले नाहिं कवनो सनेसवा हो बाबू।। गोदिये से गइल, अवाक् रह गइनीं कवनो ना बस चलल, का का ना कइनी कुहुके करेजवा कलेसवा हो बाबू।। बबुआ तुँ रहल, एह अँखिया के जोति तोहरे ला झरेला, नयनवा से मोती हूक उठे हिया हरमेसवा होपूरा पढ़ीं…

– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’ सन् 1976-77 में, जब हम गाँव के प्राथमिक विद्यालय में तीसरा-चउथा के विद्यार्थी रहीं, ओह घरी हर सनीचर के अंतिम दू घंटी में सांस्कृतिक कार्यक्रम होखे. ओकरा में हमनी कुल्ह विद्यार्थी इयाद कइल / ईया,दादी,नानी वगैरह से सुनल-सिखल कथा – कहानी, कविता – गीत, बुझउवल-पूरा पढ़ीं…

– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’ कलाम के शत शत नमन माथ ऊँचा हो गइल दुनिया में भारतवर्ष के सफल परमाणु परीक्षण बा विषय अति हर्ष के देश का ओह सब सपूतन के बधाई आ नमन जिनका पाके आज पवलस राष्ट्र एह उत्कर्ष के. शांति निरस्त्रीकरण के पक्षधर ई आजो देशपूरा पढ़ीं…

– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’ लोर ढारत निहारत रहे राह जे, ओह अँखियन से पूछीं ह का जिन्दगी। पाके आहट जे दउड़ल दरद दाब के, ओह दिल से ई पूछीं ह का जिन्दगी।। पीड़ पिघले परनवा के जब जब पिया हिया हहरे मिलन लागी तड़पे जिया सुहाग बनके जे मँगियापूरा पढ़ीं…