– हरीन्द्र हिमकर मईया लछिमी तू मड़ई में अइतू दुअरिआ पर दिअरी सजइतीं मड़ई में अइतू त चटइ बिछइतीं गाइ का गोबरा से अंगना लिपइतीं मूज का रसरिआ में आम का पतईयन से झलर-मलर झलर-मलर झलरी लगइतीं। मईया लछिमी जो अंखिया घुमइतू त राह में अंजोरिआ बिछइतीं हरदी चउरवा सेपूरा पढ़ीं…

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– डॉ० हरीन्द्र ‘हिमकर’ सीमा के पाती, बॉंची जा एह चिठ्ठी में चीख बा। दिल्लीवालन भूल ना जाईं समाचार सब ठीक बा।। धान-पान सब सूख गइल बा खेत-मजूरा चूक गइल बा। पेट-पेट में कोन्हू नाचत हियरा-हियरा हूक गइल बा। घर में कहॉं बचल अब दाना? एक आसरा भीख बा समाचारपूरा पढ़ीं…