डायरी सरगो से नीमन बाटे सइँया के गाँव रे – डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल बसंत का आइल, गाँव के इयादि एक-एक क के ऊठत-बइठत आ सूतत खा तंग करे लागलि. होलरि, खातिर रहरेठा, झीली निकाले खातिर सरसो के अबटन आ मधि रतिए होलरि-होलरि के आवाज चारों ओरि से. ओही मेंपूरा पढ़ीं…

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– डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल साइते केहू भोजपुरिहा होई जे “अंगुरी में डँसले बिया नगिनिया रे, ए ननदी सैंया के जगा द.” आ “सासु मोरा मारे रामा बाँस के छिउँकिया, ए ननदिया मोरी रे सुसुकत पनिया के जाय.” जइसन पुरबी के लोकप्रिय धुनन से परिचित ना होई. ‘पुरबी’ धुन केपूरा पढ़ीं…

डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल के डायरी प्राचार्य डॉ. संजय सिंह ‘सेंगर’ आजु स्टाफ रूम में इंस्पेक्शन के बात एक-एक क के उघरत रहे. हमरा प्राचार्य डॉ. संजय सिंह ‘सेंगर’ जी याद आ गइल रहीं आ हम भावुक हो गइल रहीं. 5 जनवरी के उहाँ से खड़े-खड़े भइल आधा घंटा केपूरा पढ़ीं…

– रामरक्षा मिश्र विमल जिम्मेदारी सघन बन में हेभी गाड़ी के रास्ता खुरपी आ लाठी के बल नया संसार स्वतंत्र प्रभार   जिम्मेदारी जाबल मुँह भींजल आँखि फर्ज के उपदेश आ निर्देश गोपाल के ठन ठन नपुंसक चिंतन   जिम्मेदारी तलवार के धार मित्रन के दुतरफा वार आदर्श विचार साँपपूरा पढ़ीं…

– डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल झीमी-झीमी बूनी बरिसावेले बदरिया लागेला नीक ना । हँसे सगरी बधरिया लागेला नीक ना । सरग बहावेला पिरितिया के नदिया छींटे असमनवा से चनवा हरदिया धरती पहिरि लिहली हरियर चुनरिया लागेला नीक ना । नील रंग के किनरिया लागेला नीक ना । बरिसि-बरिसि घन पात-पातपूरा पढ़ीं…

-डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल फागुन के आसे होखे लहलह बिरवाई. डर ना लागी बाबा के नवकी बकुली से अङना दमकी बबुनी के नन्हकी टिकुली से कनिया पेन्हि बिअहुती कउआ के उचराई. बुढ़वो जोबन राग अलापी ली अङड़ाई चशमो के ऊपर भउजी काजर लगवाई बुनिया जइसन रसगर हो जाई मरिचाई. छउकीपूरा पढ़ीं…

-डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल लागेला रस में बोथाइल परनवा ढरकावे घइली पिरितिया के फाग रे. धरती लुटावेली अँजुरी से सोनवा बरिसावे अमिरित गगनवा से चनवा इठलाले पाके जवानी अँजोरिया गावेला पात पात प्रीत के बिहाग रे. पियरी पहिरि झूमे सरसो बधरिया पछुआ उड़ा देले सुधि के चदरिया पिऊ पिऊ पिहकेलापूरा पढ़ीं…

-डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल फगुआ कहीं भा होली, ई बसंतोत्सव हउवे. बसंत जब चढ़ जाला त उतरेला कहाँ ? एहीसे त होली के रंगोत्सव के रूप में मनावल जाला. प्रकृतियो हमनी के साथ देले. नु ठंढा नु गर्मी, का मनभावन मौसम होला ! रंगन के महफिल में शिष्टता आउर सौहार्द्रपूरा पढ़ीं…

– डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल एहमें कवनो संदेह नइखे कि लोकसाहित्य में लोकगीत के जगह सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बाटे. जनजीवन में एकरा व्यापक प्रचार के स्वीकार करत राधावल्लभ शर्मा जी मानतानी कि ई गीत भावुक आ संवेदनशील जनता के हृदय के स्वाभाविक उद्गार होले सन. ईहे कारन बा कि भिन्न-भिन्नपूरा पढ़ीं…

‘विविधा’ सुप्रसिद्ध आचार्य पांडेय कपिल द्वारा संपादित भोजपुरी पत्रिकन के संपादकीय आलेखन के संग्रह हऽ. ई सभ आलेख उहाँ के द्वारा संपादित लोग, उरेह, भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका (त्रैमासिक) आ भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका (मासिक) के दिसंबर, 2001 तक के अंकन में छप चुकल बाड़े सन. एह में भोजपुरी से जुड़ल हस्तियनपूरा पढ़ीं…