– दयानंद पाण्डेय एक बार का, हज़ार बार मान लेत बानी भा निश्चिते मान लेत बानी कि नरेंद्र मोदी कुछ अउर ना आर एस एस के बिसात पर एक मामूली मोहरा हउवन. इहो मान लेत बानी कि उनकर पुरनका चेहरा सांप्रदायिकता के पाँक में सनाइल बा. गुजरात के ‘नरसंहारो’ उनुकेपूरा पढ़ीं…

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मशहूर हिन्दी साहित्यकार दयानंद पाण्डेय के लिखल हिन्दी उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं” भोजपुरी भाषा, ओकरा गायकी आ भोजपुरी समाज के क्षरण के कथे भर ना होके लोक भावना आ भारतीय समाज के चिंता के आइनो ह. गांव के निर्धन, अनपढ़ आ पिछड़ी जाति के एगो आदमी एक जूनपूरा पढ़ीं…

मोहम्मद खलील के गायकी के मादकता, मिठास आ ओकर मांसलता वाली महक लोग का मन में अबहियों ताजा बा. उनकर मिसरी जइसन मीठ आ खनकदार आवाज़ आजुओ मन में जस के तस बसल बावे. काहे कि “प्रीति में ना धोखाधड़ी, प्यार में ना झांसा, प्रीति करीं अइसे जइसे कटहर कपूरा पढ़ीं…

(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद) बीसवाँ कड़ी में भोजपुरी के दुर्दशा पर लोक कवि के दुख पढ़ले रहीं अब पढ़ीं एह उपन्यास के आखिरी कड़ी ….. अबहीं ठीक से भोर भइलो ना रहल कि लोककवि के फोन के घंटी बाजल. फोन उहे उठवलें. बाकिरपूरा पढ़ीं…

(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद) अनइसवाँ कड़ी में वकील साहब का फेर मे फँसल ठकुराइन आ धारा ६०४ वाला किस्सा पढ़ले रहीं. अब ओकरा आगा पढ़ीं….. आ अब एही वर्मा वकील के बेटा अनूप लोक कवि के वीडियो अलबम बनावे के झांसा देके उनुकापूरा पढ़ीं…

(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद) अठरहवाँ कड़ी में रउरा पढ़नी कि कइसे मीनू अपना भतार से झगड़ा क के लोक कवि के लगे रखैल बने चल अइली आ लोक कवि उनुका के ठाँव दिहलें बाकिर रखैल बनावे से मना कर दिहलें. अब ओहसे आगापूरा पढ़ीं…

(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद) सतरहवाँ कड़ी में रउरा पढ़त रहलीं मीनू का बारे में. कि कइसे ओकरा गवनई का स्टाइल में लोग आपन आपा भुला जाव. अब ओहसे आगा पढ़ीं….. एक बेर त अजबे हो गइल. कुछ बांका अतना बऊरा गइलें कि मीनूपूरा पढ़ीं…

(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद) सोरहवाँ कड़ी में रउरा पढ़ले रहीं कि कइसे आपन दलाली वसूले का फेर में गणेश तिवारी अपने पट्टीदार फौजी तिवारी का खिलाफ पोलदना के हथियार बनवलन. बाकिर जब बाद में पोलदनो पलटि गइल त ओकर समूल नाश करवा दिहलनपूरा पढ़ीं…

(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद) पन्दरहवाँ कड़ी में रउरा पढ़ले रहीं कि कइसे गणेश तिवारी झूठ के साँच आ साँच के झूठ बनावे का तिकड़म में लागल रहेले. अबकी उनुका तिकड़म के माध्यम बनल बा पोलादन जे आपन जमीन गणेश तिवारी के एगो पटीदारपूरा पढ़ीं…

(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद) चउदहवाँ कड़ी में रउरा पढ़ले रहीं कि गोपाल पंडित के बेटी के बिआह खातिर लोक कवि रुपिया त दे अइलन बाकिर बिआह ठीक ना हो पावल. सिरिफ पइसा भर से केहु के शादी ब्याह तय हो जाइत त फेरपूरा पढ़ीं…

(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद) तेरहवाँ कड़ी में रउरा पढ़ले रहीं कि कइसे लोक कवि के भतीजा एड्स के शिकार हो गइल रहुवे. रोजी रोटी कमाए परदेस गइल आदमी कइसे छन भर के आनन्द खातिर भर जिनिगी के दुख बिटोर लेता. लोक कवि केपूरा पढ़ीं…