Tag: निबन्ध

‘सूर्पनखा’ का नाक के चलते असों होली ना मनाइब.

– नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती मनबोध मास्टर दुखी मन से कहलें – असों होली ना मनाइब. मस्टराइन पूछली- काहें? ऊ कहलें – सूर्पनखा की नाक की चलते. बात सही बा. जहां-जहां…

नीमिया रे करूवाइन

– डा॰ जनार्दन राय नीनि आइल निमन हऽ. जेकरा आँखि से इहाँ का हटि जाइला ओकर खाइल-पियल, उठल-बइठल, चलल-फिरल, मउज-मस्ती, हँसी-मजाक कुल्हि बिला जाला. अइसन जनाला कि किछु हेरा गइल…

भोजपुरी लिखे पढ़े के कठिनाई आ काट

डा॰ प्रकाश उदय भाषा-विज्ञान में जवना के भाषा कहल जाला, तवना में, जवन कहे के होला, जतना आ जइसे, तवन कहा पाइत ततना आ तइसे, त केहू के ‘आने कि’…