विश्व भोजपुरी सम्मेलन के बलिया इकाई आ भोजपुरी के चर्चित पत्रिका ‘पाती’ का सहभागिता में बलिया के श्रीराम बिहार कालोनी में पाती कार्यालय का सभाकक्ष में एगो स्तरीय सरस काव्य उत्सव के आयोजन भइल. मऊ पी॰जी॰ कॉलेज के डा॰ राम निवास राय का आतिथ्य में आ डा॰ शत्रुघ्न पाण्डेय केपूरा पढ़ीं…

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– शिवबहादुर पाण्डेय ‘प्रीतम’ छोड़ीं जनि कुदरत कबो, राखीं एकर ध्यान। नाहीं तऽ बनि आपदा, ले ली राउर जान।। बद्री आ केदार के, धाम भइल शमशान। भगत लोग सब बहि गइल, चुप रहलन भगवान।। खेले में आसान बा, राजनीति के खेल। कथनी-करनी में कहीं, नइखे इचिको मेल।। लोटा डगरत बापूरा पढ़ीं…

महानगरन में रहे आ जिये वाला हिन्दी, अंग्रेजी के कुछ कवि आलोचक अपना सुविधा आ समझ का अनुसार ,कवनो अवसर पर ‘लोक‘, ‘लोकजीवन‘ आ संस्कृति के बात करेला आ मन मुताबिक अपना खास नजरिया से ओकर इस्तेमालो अपना भासन में करेला. लोकभाषा में वाचिक भा सिरजल-लिखित साहित्य के आधुनिक आलोचकपूरा पढ़ीं…

भोजपुरी के सौभाग्य बा कि एम्मे एक से एक महात्मा संत, प्रतिभाशाली राजनीतिज्ञ, विद्वान, हुनरमन्द कलाकार, वैज्ञानिक आ समाज सेवियन क लमहर कतार बा. विशाल भू-भाग, नदी-पहाड़ आ कृषि संपदा बा. वाचिक संपदा का साथ सिरजल साहित्य बा बाकि भोजपुरी के दुर्भाग्य ई बा कि सबकुछ का बादो एकर अपनेपूरा पढ़ीं…

“भोजपुरी दिशाबोध के वैचारिक साहित्यिक पत्रिका “पाती” एगो अइसन रचनात्मक मंच ह जवन भोजपुरी भाषा साहित्य के एगो नया पहिचान दिहलसि. एकरा रचनात्मक आंदोलन से जुड़ के अनेके लेखक राष्ट्रीय स्तर पर आपन पहचान बनवलन.” ई कहना रहल डा.श्रीराम सिंह के जे विश्व भोजपुरी सम्मेलन के बलिया ईकाई का ओरपूरा पढ़ीं…

(पाती के नयका अंक, दिसंबर २०१२, के संपादकीय) (भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका “पाती” के भोजपुरी प्रकाशनन में एगो खास जगहा बा. अँजोरिया के एह बात के खुशी बा कि पाती संगे एकर अपनापन पिछला कई बरीसन से चलल आवत बा. पाती के प्रकाशित अंक अँजोरिया का मार्फत दुनिया भरपूरा पढ़ीं…

– डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल अपना प्रिय अंदाज, मिसिरी के मिठास आ पुरुषार्थ के दमगर आवाज का कारन भोजपुरी शुरुए से आकर्षण के केंद्र में रहल बिया. भाषा निर्भर करेले विशेष रूप से भौगोलिक कारन आ बोलेवाला लोगन के आदत, रुचि आ प्रकृति पर. विशेष परिस्थिति एह में आपन बरियारपूरा पढ़ीं…

(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 23वी प्रस्तुति) – रिपुसूदन श्रीवास्तव जिन्दगी हऽ कि रूई के बादर हवे, एगो ओढ़े बिछावे के चादर हवे. जवना घर में ना पहुँचे किरिन भोर के जवना आँखिन से टूटे ना लर लोर के केकरा असरे जिए ऊ परानी इहाँ जहवाँपूरा पढ़ीं…

जिये-जियावे क सहूर सिखावत अमानुस के मानुस-मूल्य देबे वाली ‘गंगा-तरंगिनी’ ‘गंगा-तरंगिनी’ (काव्य-कथा) अभिधा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर. मूल्य – पचास रुपये. प्रथम संस्करण. कवि – रविकेश मिश्र (पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 22वी प्रस्तुति) – सांत्वना द्विवेदी गंगा के दूनो पाट मनुष्य के जिये आ जियावे के सहूरपूरा पढ़ीं…

(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 21वी प्रस्तुति) – सुशील कुमार तिवारी जइसन कि धर्म ग्रंथन में कहल गइल बा ‘धरेतिसः धर्मः’। माने कि देश अउर काल के हिसाब से उचित अनुचित के निर्धरण कइल आ ओकेरा अनुसार व्यवहार कइल धरम होला। एह चीज के समझे-बूझे खातिरपूरा पढ़ीं…

(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 20वी प्रस्तुति) – कमलेश राय एक अंग-अंग मिसिरी में बोर गइल फागुन रस घेर गइल! पतझर के पीरा के हियरा से बिसरा के थिरकि उठल बगियन में गांछ-गांछ अगरा के डाढि आज सगरी लरकोर भइल! पसरल सगुन रंग खेतन-सिवानन में भौंरापूरा पढ़ीं…