– चन्द्रदेव यादव (एक) पवन पानी धूप खुसबू सब हकीकत ह, न जादू ! जाल में जल, हवा, गर्मी गंध के, के बान्ह पाई? रेत पर के घर बनाई? हम नदी क धार देखीं फिर आपन बेवहार देखीं, भूमि-जल पर आज नइकी सभ्यता क मार देखीं जेह दिया से होपूरा पढ़ीं…

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– डा॰ अशोक द्विवेदी ‘लोक’ के बतिये निराली बा, आदर-निरादर, उपेक्षा-तिरस्कार सब के व्यक्त करे क ‘टोन’ आ तरीका अलगा बा. हम काल्हु अपना एगो मित्र किहाँ गइल रहलीं, उहाँ दुइये दिन पहिले उनकर माई उनका गाँव आरा (बिहार) से आइल रहुवी. पलग्गी आ हाल चाल का बाद अनासो हमरापूरा पढ़ीं…

– डाॅ. अशोक द्विवेदी गंगा, सरजू, सोन का पाट में फइलल खेतिहर-संस्कृति दरसल “परिवार” का नेइं पर बनल गृहस्थ संस्कृति हऽ. परिवार बना के रहे खातिर पुरुष स्त्री क गँठजोरा क के बिवाह संस्कार से बान्हल आ मर्यादित कइला का पाछा सृष्टिकारी कर्म के गति देबे क भावना रहे. घरपूरा पढ़ीं…

– डाॅ. अशोक द्विवेदी हमार बाबा, ढेर पढ़ुवा लोगन का बचकाना गलती आ अज्ञान पर हँसत झट से कहसु, “पढ़ लिखि भइले लखनचन पाड़ा !” पाड़ा माने मूरख; समाजिक अनुभव-ज्ञान से शून्य. आजकल तऽ लखनचंद क जमात अउर बढ़ले चलल जाता. ए जमात में अधूरा ज्ञान क अहंकार आ छेछड़पनपूरा पढ़ीं…