Tag: बतकुच्चन

अगवढ़ आ अगवाह (बतकुच्चन – 187)

बतकुच्चन आ समाचारन में कवनो संबंध ना होखे बाकिर समाचारन से बतकुच्चन करे के मसाला मिलत रहेला. अब देखीं ना, फोने क के एगो नामी वकील अपना नामी आरोपी के…

गोत आ गोतिया के चरचा (बतकुच्चन – 186)

बात धरमपत्नी से बढ़ के गोत्र आ कुल खानदान पर आ गइल बा. एगो गोत के लोग दोसरा गोत के उपद्रवियन के गोतिया का बता दिहल कि सामने वाला बात…

धरमपत्नी त होला बाकिर धरमपति काहे ना होखे (बतकुच्चन – 185)

दिमाग में अगिला बतकुच्चन के ताना बानबुनत जात रहनी तबले रमचेलवा भेंटा गइल. देखते पूछलसि, ए बतकुचन, बतावऽ धरमपत्नी त होला बाकिर धरमपति काहे ना होखे. बूझ गइनी कि बाबा…

जनतब, अनचिन्हार आ परिचिताह (बतकुच्चन – 184)

जनतब, अनचिन्हार आ परिचिताह. तीनो के तीनो जान-पहचान से जुड़ल शब्द आ आजु के बतकुच्चन एकनिए पर. जनतब के जगहा हिन्दी में जंतव्य ना होखे आ हिन्दी के गंतव्य का…

कवन खाना खाइल ना जाव? (बतकुच्चन – 183)

पिछला बेर दहल, दहलल, आ दलकल के चरचा पर बात रोकले रहीं आजु ओहिजे से आगा बढ़ल चाहब. बाकिर बचपन के याद आवत बा जब सियालदह लोकल में एगो किताब…

बेमानी आ बेईमानी के बात (बतकुच्चन – 181)

ए सूरदास, घीव पड़ल? कड़कड़ाव तब नू जानी. कारण आ परिणाम के एह उदाहरण में परिणाम से पता चलत बा कारण का बारे में. सूरदास खातिर परिणामे प्रमाण बा कि…

अर्थ, अनर्थ आ कुअर्थ के चरचा (बतकुच्चन – 180)

अर्थ का बिना सबकुछ व्यर्थ होला. चाहे ऊ कवनो बाति होखो भा आदमी. कुछ दिन पहिले हम कहले रहीं अर्थ, अनर्थ, कुअर्थ वगैरह के चरचा के बात. फेर बीच में…

नवासी का फेर में आवासी आ निवासी के चरचा (बतकुच्चन – 179)

पिछला 2 नवंबर का दिने मारीशस आप्रवासियन के अइला के 180वां सालगिरह मनवलसि. एही दिने भारत से गइल गिरमिटिहा मजदूर पहिला बेर मारीशस का किनार पर पानी के जहाज से…

गति से दुर्गति ले (बतकुच्चन – 178)

एगो गति संज्ञा होले आ दोसरका गति भा गत विशेषण. दुनू में छोटकी इ के मात्रा लागेला बाकिर दोसरका गति से छोटकी इ के मात्रा हट गइल काहे कि उ…