(भोजपुरी ग़ज़ल) – शैलेंद्र असीम तहरी अँखिया में पानी बुझाते न बा पीर केतना सहीं हम, सहाते न बा रोज चूवेले टुटही पलानी नियन ई जिनिगिया के मड़ई छवाते न बा उनके अँगुरी के मुनरी चनरमा भइल हाथ केतनो बढ़ाईं, छुवाते न बा कानि का उनका कहला में जादू रहलपूरा पढ़ीं…

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– डा0 अशोक द्विवेदी दउर- दउर थाकल जिनगानी कतना आग बुतावे पानी ! बरिसन से सपना सपने बा ; छछनत बचपन बूढ़ जवानी । हरियर धान सोनहुली बाली, रउरे देखलीं , हम का जानी ? कबहूँ -कबहूँ क्षुधा जुड़ाला जहिया सबहर जरे चुहानी । पूत -पतोह बसल परदेसे – उचटलपूरा पढ़ीं…

– मनोज भावुक (१) सर से हाथ हटा के देखीं , हाथ-पैर चला के देखीं, कुछ ना कुछ रस्ता निकली,बुद्धि के दउरा के देखीं पहिले त उठ्ठीं-जागीं, फिर आलस के कंबल फेकीं मन जरूर फरहर होई, दाढ़ी बाल बनवा के देखीं दूध के धोवल केहू नइखे ,सब हमाम में नंगापूरा पढ़ीं…