– डॉ अशोक द्विवेदी लोकभाषा में रचल साहित्य का भाव भूमि से जुड़े आ ओकरा संवेदन-स्थिति में पहुँचे खातिर,लोके का मनोभूमि पर उतरे के परेला। लोक कविताई के सौन्दर्यशास्त्र समझे खातिर लोकजीवन के संस्कृति, लोकदृष्टि ओकरा अनुभव-सिद्ध मान्यता आ संवेदन-ज्ञान के समझल जरूरी बा। अक्सरहा एघरी,कुछ लोग भोजपुरी साहित्य आपूरा पढ़ीं…

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– शिवबहादुर पाण्डेय ‘प्रीतम’ छोड़ीं जनि कुदरत कबो, राखीं एकर ध्यान। नाहीं तऽ बनि आपदा, ले ली राउर जान।। बद्री आ केदार के, धाम भइल शमशान। भगत लोग सब बहि गइल, चुप रहलन भगवान।। खेले में आसान बा, राजनीति के खेल। कथनी-करनी में कहीं, नइखे इचिको मेल।। लोटा डगरत बापूरा पढ़ीं…

महानगरन में रहे आ जिये वाला हिन्दी, अंग्रेजी के कुछ कवि आलोचक अपना सुविधा आ समझ का अनुसार ,कवनो अवसर पर ‘लोक‘, ‘लोकजीवन‘ आ संस्कृति के बात करेला आ मन मुताबिक अपना खास नजरिया से ओकर इस्तेमालो अपना भासन में करेला. लोकभाषा में वाचिक भा सिरजल-लिखित साहित्य के आधुनिक आलोचकपूरा पढ़ीं…

भोजपुरी के सौभाग्य बा कि एम्मे एक से एक महात्मा संत, प्रतिभाशाली राजनीतिज्ञ, विद्वान, हुनरमन्द कलाकार, वैज्ञानिक आ समाज सेवियन क लमहर कतार बा. विशाल भू-भाग, नदी-पहाड़ आ कृषि संपदा बा. वाचिक संपदा का साथ सिरजल साहित्य बा बाकि भोजपुरी के दुर्भाग्य ई बा कि सबकुछ का बादो एकर अपनेपूरा पढ़ीं…