– अल्पना मिश्र (1) प्रेम में डूबल औरत प्रेम में डूबल औरत एक-एक पल-छिन सहेजत-सम्हारत रहेले। ‘कइसे उठाईं ई ‘छन’ कहाँ धरीं जतन से…’ इहे सोच-सोच के कई बरिस ले मुस्कियात रहे ऊ मने-मन कि अइसन होई ऊ …ओइसन होई कइसन होई… तऽ ऊहे चलि आइल एकदिन दबे-पाँव। प्रेम मेंपूरा पढ़ीं…

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– रामयश अविकल चलीं ई सबुर के बन्हल-बान्ह टूटल कमाये बदे आज घर-गाँव छूटल। मिलल मार गारी, मजूरी का बदला सरेआम अब आबरू जाय लूटल। भवन तीन-महला शहर में बा उनकर हमन के त झाँझर पलनियो ले टूटल। इहाँ दाल-रोटी चलल बाटे मुस्किल दइब टेढ़ भइले करमवो बा फूटल। दबंगनपूरा पढ़ीं…

– स्व. आचार्य विश्वनाथ सिंह (ई दस्तावेजी आलेख एह खातिर दिहल जाता कि भोजपुरी लिखे-पढे़े में लोगन के सहायक-होखो) भोजपुरी भाषा में उच्च कोटि के साहित्य-रचने करे खातिर ना, ओकर सामान्य रूप से पठन-पाठन करे खातिर आ ओकरा के कलम के भाषा बनावहू खातिर ओकर मानक वर्तनी के निर्धारण आवश्यकपूरा पढ़ीं…

– डा॰ अशोक द्विवेदी ‘लोक’ के बतिये निराली बा, आदर-निरादर, उपेक्षा-तिरस्कार सब के व्यक्त करे क ‘टोन’ आ तरीका अलगा बा. हम काल्हु अपना एगो मित्र किहाँ गइल रहलीं, उहाँ दुइये दिन पहिले उनकर माई उनका गाँव आरा (बिहार) से आइल रहुवी. पलग्गी आ हाल चाल का बाद अनासो हमरापूरा पढ़ीं…

भोजपुरी के नियमित रूप से प्रकाशित हो रहल पत्रिकन में खास जगहा बना लिहले बिया हेलो भोजपुरी पत्रिका. एकर जुलाई अंक मिलल त देख पढ़ के मन खुश हो गइल. पत्रिका में भोजपुरी सामग्री भरल बा त कुछ रचना हिंदी आ अंगरेजिओ में बा. सराहे जोग बहुत कुछ बा एहपूरा पढ़ीं…

कुछ साथी-सहयोगियन का सुझाव / निहोरा पर जब ‘प्रेम’ पर केन्द्रित कविता पर अंक के बिचार बनल त हम जल्दी-जल्दी भोजपुरी कवियन से संपर्क सधनी. ओइसे त प्रतिक्रिया उछाहे भरल रहे, बाकिर कुछेक भाई लोग अइसनो मिलल, जे या त लजइला लेखा या अजीब उटपटाँग जबाब दिहल; जइसे… ‘छोड़ीं’ जी,पूरा पढ़ीं…

– ओमप्रकाश अमृतांशु अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के २५वाँ राष्ट्रीय अधिवेशन में ‘हेलो भोजपुरी’ पत्रिका के विमोचन बिहार के पुर्व उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के हाथे भइल. एह अवसर प केन्द्रीय मंत्री रहल रविशंकर प्रसाद, सम्मेलन के अध्यक्ष रिपूसुदन प्रसाद, बिहार विधान परिषद के अध्यक्ष अवधेश नारायण, विधायकपूरा पढ़ीं…

(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 23वी प्रस्तुति) – रिपुसूदन श्रीवास्तव जिन्दगी हऽ कि रूई के बादर हवे, एगो ओढ़े बिछावे के चादर हवे. जवना घर में ना पहुँचे किरिन भोर के जवना आँखिन से टूटे ना लर लोर के केकरा असरे जिए ऊ परानी इहाँ जहवाँपूरा पढ़ीं…

जिये-जियावे क सहूर सिखावत अमानुस के मानुस-मूल्य देबे वाली ‘गंगा-तरंगिनी’ ‘गंगा-तरंगिनी’ (काव्य-कथा) अभिधा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर. मूल्य – पचास रुपये. प्रथम संस्करण. कवि – रविकेश मिश्र (पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 22वी प्रस्तुति) – सांत्वना द्विवेदी गंगा के दूनो पाट मनुष्य के जिये आ जियावे के सहूरपूरा पढ़ीं…

(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 21वी प्रस्तुति) – सुशील कुमार तिवारी जइसन कि धर्म ग्रंथन में कहल गइल बा ‘धरेतिसः धर्मः’। माने कि देश अउर काल के हिसाब से उचित अनुचित के निर्धरण कइल आ ओकेरा अनुसार व्यवहार कइल धरम होला। एह चीज के समझे-बूझे खातिरपूरा पढ़ीं…

(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 20वी प्रस्तुति) – कमलेश राय एक अंग-अंग मिसिरी में बोर गइल फागुन रस घेर गइल! पतझर के पीरा के हियरा से बिसरा के थिरकि उठल बगियन में गांछ-गांछ अगरा के डाढि आज सगरी लरकोर भइल! पसरल सगुन रंग खेतन-सिवानन में भौंरापूरा पढ़ीं…