– रामदेव शुक्ल ‘अकाट गरीबी में जाँगर फटकत जनम बिता देबू कि तनिएसा मन बदलि के अमीर हो जइबू? सोचि समुझि ल, अपने मालिक से बतिया लऽ, हमके बिहने बता दीहऽ।’ कहि के मौसी चलि गइली। कुसुम लगली अपने मन में बाति के मथे। मौसी कहतियॉ कि आन के बेटापूरा पढ़ीं…

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– रामदेव शुक्ल मीतू हम दूनू जने उहाँ पहुंचि गइल बानी जाँ, जहाँ से लवटले के कवनो राहि नइखे बँचल। अगहीं बढ़े के बा, चाहे एहर बढ़ि चलल जा, चाहे ओहर। बोलऽ कवने ओर चलल जाव? मीता के लिलार चमकि उठल। कहली- ”तहार कहल आ हमार सूनल, ई कबसे होपूरा पढ़ीं…