(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद) सातवाँ कड़ी में रउरा पढ़ले रहीं कि पत्रकार के नाराजगी का बादो लोक कवि के सम्मान मिलल आ सम्मानित होखला का बाद ऊ अपना गाँवे चहुँपलन. चेयरमैनो साहब उनुका साथही रहलन आ दस हजार रुपिया दे के लड्डू लेपूरा पढ़ीं…

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(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद) छठवाँ कड़ी में रउरा लोक कवि के सम्मान खातिर तिकड़म भिड़ावत पत्रकार का बारे में पढ़ले रहीं जे ओकरा बदले में अपना खातिर लोककवि से उनुका ग्रुप के एगो लड़की के डिमाण्ड रखले रहे. अब ओकरा से आगे पढ़ींपूरा पढ़ीं…

(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद) पँचवा कड़ी में रउरा पढ़ले रहीं कि लोक कवि के तरह अपना ग्रुप का लड़िकियन का साथे बेवहार करत रहले. पतन का राह पर गँवे गँवे छिछिलात बिछिलात गिरल जात रहले. उनका कुण्ठो के दर्शन हो चुकल बा रउरा.पूरा पढ़ीं…

(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद) दुसरका कड़ी से आगे….. बाजार में लोककवि के कैसेटन के बहार रहे आ उनुकर म्यूजिकल पार्टी चारो ओर छवले रहे. उनुकर नाम बिकाव. गरज ई कि ऊ “मार्केट” में रहले. बाकिर मार्केट के साधत-साधत लोक कवि में ढेरे अंतर्विरोधोपूरा पढ़ीं…