– शशि प्रेमदेव ना सनेहि के छाँव, न ममता के आँचर बा गाँव में! का जाई उहवाँ केहू अब, का बाँचल बा गाँव में? छितिर बितिर पुरुखन के थाती, बाग-बगइचा, खपड़इला! खरिहानी में जगहे-जगहा जीव जनावर के मइला! ना कजरी के गूँज, ना फगुआ के हलचल बा गाँव में! आँगनपूरा पढ़ीं…

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– शशि प्रेमदेव जेकरा पर इलजाम रहल कि गाँछी इहे उजरले बा! फल का आस में सबसे पहिले ऊहे फाँड़ पसरले बा! दूर से ऊ अँखियन के एतना रसगर लगल, लुभा गइलीं हाथ में जब आइल त देखलीं कउवा ठोढ़ रगड़ले बा. प्यार से बढ़ि के दोसर कवनो ताकत नइखेपूरा पढ़ीं…

– शशि प्रेमदेव हे बाहुबली! बँहिआ में त हमहन के भी ओतने दम बा! बाकिर तहरा पाले लाठी, भाला, बनूखि, गोली, बम बा!! तहरे चरचा बा घरे घरे बाजे सगरो डंका तहरे काहें ना जोम देखइबऽ तूँ तहरा पेसाब से दिआ जरे चउकी से ले के चउका तक, तहरे तपूरा पढ़ीं…