– प्रिंस रितुराज दुबे ईहां कवनो एल्बम के गाना नइखे लिखल जात, ई एगो साच कथन मनोज तिवारी जी के एल्बम से लिहल गइल बा. भोजपुरी, जवन पूरा दुनिया में अपना मौजूदगी के ताल ठोकत बा, ओही भोजपुरी के जनमे स्थान में हार हो गइल बा. जहाँ बिदेश में मॉरिशसपूरा पढ़ीं…

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बावन पेज के पत्रिका, चार पेज विज्ञापन के, चार पेज संपादकीय सामग्री, बाँचल चउवालीस पेज. तरह तरह के तेरह गो संपादक बाकिर प्रूफ आ भाषा के गलतियन के भरमार का बीच भोजपुरी पंचायत पत्रिका के दिसम्बर 14 वाला अंक में भोजपुरी में मिलल लोकभाषा (भोजपुरी?) में कार्यकारी संपादक प्रभाकर पाण्डेयपूरा पढ़ीं…

– – ओमप्रकाश सिंह आजुए ईमेल से मिलल भोजपुरी पंचायत पत्रिका के नवम्बर 2014 अंक देखि के मन मिजाज खुश हो गइल. अगर भोजपुरी से छोह के बात हटा दिहल जाव त पत्रिका के कलेवर बहुते स्तरीय बा. सोना पर सोहागा वाला बाति होखीत अगर ई पत्रिका भोजपुरी में छपलपूरा पढ़ीं…

– मनोज श्रीवास्तव केहू के जब आपन खाली घर-दुआर आ आपन गाँव जवार छुटेला त मन केतना भारी हो जाला आ तब त आपन देसे छुटल रहे. ओह घरी कवनो सुख से केहू आपन घर-दुआर, गाँव-जवार भा देसे छोड़ के परदेस थोड़े गइल रहे लोग. खाली अपना परिवार के जीवनपूरा पढ़ीं…

– आशुतोष कुमार सिंह आदमी के सुभाव बुझल बहुते कठिन बा. एकरा के जेतना गहराई से बुझे के प्रयास करीले, ओही अनुपात में अउरी अनबुझाह होत चलि जाले. बाकिर पिछला (30 सितम्बर 2010) के आंखि का सोझा एगो अइसन घटना घटल कि एह मानवीय स्वभाव के समुझे के एगो अउरपूरा पढ़ीं…

– प्रभाकर पाण्डेय “गोपालपुरिया” ओह दिन माई घर का पिछुवाड़े बइठि के मउसी से बार झरवावत रहे. तवले कहिं बाबूजी आ गइने अउर माई से पूछने की का हो अबहिन तइयार ना भइलू का? केतना टाइम लगावतारू? माई कहलसि, “बस हो गइल, रउआँ चलिं हम आवतानी.” खैर हम समझि नापूरा पढ़ीं…

– धर्मेन्द्र कुमार पाण्डेय, गोरखपुर देश के पहिलका स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी बलिया के मंगल पाण्डे के बगावत अंगरेजन के कँपा दिहले रहुवे. मंगल पाण्डेय के सैनिक कोर्ट से दू गो अंगरेज अफसरन के हत्या आ सेना से बगावत का आरोप में फाँसी के सजाय दिहल गइल. फाँसी के तारीखपूरा पढ़ीं…