एगो पाठक नीरज का बहाने

by | Jan 5, 2012 | 3 comments

काल्हु अँजोरिया के एगो सम्मानित पाठक नीरज जी जानल चहले कि सुर के महासंग्राम के आडिशन पटना में कहिया होखी? उनुका सवाल के जवाब लिखे बइठनी त बहुत कुछ अइसन लिखा गइल कि सोचनी कि एकरा के अलगे पोस्ट कर दीं.

पता ना का चाहत बावे महुआ टीवी चैनल आ का मन में बावे ओकरा प्रचारक के. महुआ टीवी के अपनो वेबसाइट पर एह बारे में कवनो जानकारी नइखे. जवने जानकारी बा तवन महुआ टीवी चैनल पर. बइठ जाईं ओकरा आगा कलम कागज लेके आ जब एह महासंग्राम के जानकारी आवे तब लिख लीं.

सुर संग्राम एक आ दू के मिलल सफलता का बाद होखे के त ई चाहत रहे कि सुरसंग्राम तीन करावल जाव बाकिर शायद एहले नइखे करावल जात कि अबही ले सुर संग्राम दू के फाइनल नइखे हो पावल. जज लोग आ अंकर लोग के भुगतान के विवाद अलगा बा.

एही सब का चलते हम कई बेर कह चुकल बानी कि महुआ भा कवनो टीवी चैनल, कवनो संगीत कंपनी, कवनो फिल्म, कवनो फिल्मकार से अँजोरिया वेबसमूह के कवनो संबंध नइखे. प्रचारकन से मिले वाला जानकारी रउरा सभे तक चहुँपा दिहिले काहे कि अँजोरिया समूह हमेशा भोजपुरी आ एह भाषा में काम करे वालन के बढ़ावा देत आइल बा, देत आवत रही. अँजोरिया समूह के प्रकाशन बलिया से कइल जाला जहवाँ टीवी भा सिनेमा भा संगीत का बारे में कवनो जानकारी ले पावल मुश्किल होला. दोसरे भोजपुरी के वेबसाइटन के प्रकाशन आर्थिक सक्षम नइखन स कि आपन संवाददाता आ आपन ब्यूरो चलावल जा सके.

एह दिसाईं पाठक लोग के सक्रिय सहयोग के अपेक्षा रहेला कि ऊ लोग अपना स्रोत से मिलल जानकारी के बाकी पाठकन से मिल बाँटे लोग. अगर अइसन होखे लाग जाव त सिनेमा आ टीवी चैनल का बारे में सही सही जानकारियो मिल पाई. बाकिर रउरा सभे बानी कि कुछ बाँटे के तइयारे नइखीं. आइलें, जवन मिलल तवना के देखनी, पढ़नी आ चल दिहनी बिना कुछ कहले, बिना कवनो टिप्पणी मरले.

घरो में आदमी खाना खाला त ओकरा बारे में अगर टिप्पणी ना करे त रसोईया के मन टूटेला. ना विश्वास होखे त अपने घर में पूछ लीं. सामने वाला चटखारा ले के खाय, बड़ाई करे त बनावे परोसे वाला के आनन्द मिलेला आ काम के थकान खतम हो जाला. अगर खराब लागल भा पसन्द ना आइल तबहियो बतावल जरूरी होला जेहसे कि रसोईया अगिला बेर सचेत रहो.

हमार काम रसोईये जइसन बा. टिप्पणी दिहल राउर काम होखे के चाहीं. रोजाना नाहियों त चार सौ लोग जरूरे आवत होई अँजोरिया पर ओहमें से चालीसो पचास लोग टिप्पणि देबे लागे तब भोजपुरी आ एह से जुड़ल लोगन के काम में गुणात्मक परिवर्तन अइला बिना ना रही.

बाकी राउर मरजी.

राउर,
संपादक, अँजोरिया

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3 Comments

  1. OP_Singh

    धन्यवाद संजीव जी.

  2. संजीव सिंह

    संपादक जी प्रणाम,

    हेतना निराश होखेम तऽ काम ना चली। हम मानत बानी कि लोग टिप्पणी करे से कगरीया जाला, बाकीर कम से कम ऐह वेबसाईट पऽ आवे ला तऽ जरूर। अपना भाषा मे समाचार, कहानी, कथा, कविता पढे ला तऽ जरूर। अउर रउआ मानी आ चाहे मत मानी, हेतना सभ कुछ पढला के बाद कहीयो ना कहीयो तऽ लोग के मन मे अपना हाथ से कुछवु लिखे के मन करी।

    जईसे एगो बढीया वक्ता उहे आदमी बन सकत बावे जे कबो एगो सुथर श्रोता रहल होखे। वईसे ही रोज-रोज पढला के बाद आदमी कुछवु ना कुछवु त लिखबे करी कहीयो। ऐह से हबडाई मत। भोजपुरी के पहिला वेबसाईट के संपादक जब ऐह त हबडा जाई त नवहा लिखनीहार लोग कहाँ जाई?

    हम मानत बानी कि कवनो इंसान के अपना काम मे मन तबे लागेला जब केहू ओकर हौसला अफजाई करो बाकीर ई जरूरी भी नईके। निश्चय करी अपना मन मे उहे जवन अँजोरिया के शुरूवात के घरी कईले रहनी। विश्वास रखी एक ना एक दिन लोग के आदत जरूर सुधरी।

    संजीव

  3. प्रभाकर पाण्डेय

    घरो में आदमी खाना खाला त ओकरा बारे में अगर टिप्पणी ना करे त रसोईया के मन टूटेला. ना विश्वास होखे त अपने घर में पूछ लीं. सामने वाला चटखारा ले के खाय, बड़ाई करे त बनावे परोसे वाला के आनन्द मिलेला आ काम के थकान खतम हो जाला. अगर खराब लागल भा पसन्द ना आइल तबहियो बतावल जरूरी होला जेहसे कि रसोईया अगिला बेर सचेत रहो.

    संपादकजी…सदा सत्य…

    हमार काम रसोईये जइसन बा. टिप्पणी दिहल राउर काम होखे के चाहीं. रोजाना नाहियों त चार सौ लोग जरूरे आवत होई अँजोरिया पर ओहमें से चालीसो पचास लोग टिप्पणि देबे लागे तब भोजपुरी आ एह से जुड़ल लोगन के काम में गुणात्मक परिवर्तन अइला बिना ना रही.

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अबहीं ले 13 गो भामाशाहन से कुल मिला के सात हजार तीन सौ अठासी रुपिया (7388/-) के सहयोग मिलल बा. सहजोग राशि आ तारीख का क्रम से पाँच गो सर्वश्रेष्ठ भामाशाह -
(1)
अनुपलब्ध
18 जून 2023
गुमनाम भाई जी,
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(3)

24 जून 2023 दयाशंकर तिवारी जी,
सहयोग राशि - एगारह सौ एक रुपिया
(4)
18 जुलाई 2023
फ्रेंड्स कम्प्यूटर, बलिया
सहयोग राशि - एगारह सौ रुपिया
(7)
19 नवम्बर 2023
पाती प्रकाशन का ओर से, आकांक्षा द्विवेदी, मुम्बई
सहयोग राशि - एगारह सौ रुपिया

(11)
24 अप्रैल 2024
सौरभ पाण्डेय जी
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सुतला मे, जगला में, चेत में, अचेत में। बारी, फुलवारी में, चँवर, कुरखेत में। घूमे जाला कतहीं लवटि आवे सँझिया, चोरवा के मन बसे ककड़ी के खेत में। - संगीत सुभाष के ह्वाट्सअप से


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