टंच माल के चरचा (बतकुच्चन – १२२)

by | Aug 19, 2013 | 1 comment


पिछला दिने टंच माल के बात बड़हन चरचा में रहल. जेकरा के टंच माल कहल गइल रहे उनका ई आपन बड़ाई लागल बाकिर आम आदमी के एह बात में बहुत कुछ आपत्तिजनक लागल. कहे वाला आ जेकरा ला कहल गइल ओकरा त कुछ खराब ना लउकल बाकिर दोसरा लोग के बहुते शिकायत रहल एह बात से. टंच माल के चरचा हमरो के सोचे पर मजबूर कर दिहलसि आ शहादत हसन मंटो के कहल बात याद पड़ गइल कि औरत के छाती के छाती ना कहीं त का कहीं? तब मंटो अपना पर लगावल अश्लीलता के आरोप के जवाब देत रहलन आ शिकायत करे वाला के कहना रहे कि मंटो अपना कहानी में छाती शब्द लिखले बाड़न.

आए दिन बहुते लोग भोजपुरीओ पर आरोप लगावेला कि भोजपुरी में बहुते कुछ अश्लील बा. आ एही चलते बहुते श्लील लोग भोजपुरी बोले बतियावे से कतराला. हमहू सोचनी कि काहे ना आजु बतकुच्चन में एह श्लील आ अश्लीले के चरचा कर लिहल जाव. एक जमाना में लैटिन आ ग्रीक भाषा के विद्वान अंगरेजी के हिकारत भरल नजर से देखसु आ कहसु कि अंगरेजी इज ए वल्गर लैंग्वेज. डिक्शनरी में देखीं त वल्गर के बहुते परिभाषा मिल जाई बाकिर ले दे एक बात खास रही कि आम आदमी के भाषा अक्सरहा बाकी लोग के वल्गर अश्लील लाग जाला. अश्लील आ फूहड़ में इहे सबले बड़का फरक होला कि गँवई भा आम आदमी के बोलचाल के बहुते शब्द अश्लील होखला का चलते फूहड़ मान लिहल जाला. जबकि ठीक ओही मतलब वाला दोसर शब्द श्लील मानल जाला काहे कि उ विद्वानन का इस्तेमाल में रहेला. ना मानत होखीं त एगो शब्द देख लीं सहवास. एकरा जगह अगर आम बोलचाल के शब्द इस्तेमाल कइल जाव त निनान्बे फीसदी लोग के खराब लाग जाई. बात उहे रही बाकिर कहे वाला का आ कहला के अंदाज का हिसाब से अंतर पड़ जाई. कई बेर त बिल्कुल सही शब्द के एह तरह से इस्तेमाल कर लिहल जाला कि बूझे वाला बूझिओ जाव आ कहे वाला देह झार के निकलियो जाव कि हम कवनो अइसन बेजा बात नइखी कहले. अइसहीं कई बेर कुछ कहला के मतलब उ निकाल लिहल जाला जवन कहे वाला कहले ना चाहत रहुवे. जाकी रही भावना जइसी प्रभु मूरत देखिन तिन तइसी.

कई बेर त कह दिहला का बाद पता चलेला कि अरे बाप रे, एकर त ईहो मतलब निकालल जा सकेला. जइसे कि एकदिन हिंदी प्राध्यापक पढ़ावत रहलन कि शब्द चयन में आ वाक्य में ओकरा प्रयोग में हमेशा सावधानी बरते के चाहीं काहे कि हर बात के दू गो मतलब निकालल जा सकेला. एगो लइकी पूछ दिहलसि कि कइसे? तनी निकाल के देखाईं. आ पूरा क्लास ठहाका मार दिहलसि तब जा के ओह छात्रा के पता लागल कि ओकरो बात के गलत मतलब निकाल लिहल गइल. ओकरा कहला के मतलब साफ रहुवे बाकिर सुनेवाला के मकसद गलत रहुवे से ऊ लोग ओकर गलत मतलब निकाल लिहल. दोसरे हर भाषा ओह समाज के दर्पण मानल जाले जवना में उ भाषा बोलल जाले. एहसे एक भाषा के श्लील शब्द दोसरा में अश्लील मानल जा सकेला. एगो दोसर समस्या होला लिखल आ बोलल शब्दन में. बढ़िया से बढ़िया बात के एह अंदाज में कहल जा सकेला कि ओकर गलत मतलब निकल जाव. एहिजा शब्द से अधिका असर होला ओकरा इस्तेमाल के अंदाज के आ कवना संदर्भ में उ शब्द बोलल गइल एकरा से. बाकिर एगो सावधानी हमेशा बरते के चाहीं कि कवनो बात अइसन मत कहल जाव जवना के आम आदमी गलत मतलब निकालत होखे. पढ़ल लिखल आदमी के समुझावल आसान होला बाकिर बुड़बक के ना. तबे नू कहल गइल कि बुड़बक बुझावे से मरद.

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1 Comment

  1. omprakash amritanshu

    हा.. हा.. हा. . मजा आ गईल।

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अँजोरिया के भामाशाह

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पर भेज दीं. सभकर नाम शामिल रही सूची में बाकिर सबले बड़का पाँच गो भामाशाहन के एहिजा पहिला पन्ना पर जगहा दीहल जाई.
अबहीं ले 13 गो भामाशाहन से कुल मिला के सात हजार तीन सौ अठासी रुपिया (7388/-) के सहयोग मिलल बा. सहजोग राशि आ तारीख का क्रम से पाँच गो सर्वश्रेष्ठ भामाशाह -
(1)
अनुपलब्ध
18 जून 2023
गुमनाम भाई जी,
सहयोग राशि - एगारह सौ रुपिया

(3)

24 जून 2023 दयाशंकर तिवारी जी,
सहयोग राशि - एगारह सौ एक रुपिया
(4)
18 जुलाई 2023
फ्रेंड्स कम्प्यूटर, बलिया
सहयोग राशि - एगारह सौ रुपिया
(7)
19 नवम्बर 2023
पाती प्रकाशन का ओर से, आकांक्षा द्विवेदी, मुम्बई
सहयोग राशि - एगारह सौ रुपिया

(11)
24 अप्रैल 2024
सौरभ पाण्डेय जी
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