बतकुच्चन – ९८

by | Feb 22, 2013 | 0 comments


केहू ढुकल, केहू ढुकावल, आ केहू ढुका लागल देखत रहि गइल. ढकना, ढकनी, ढाकल, तोपल त बहुते सुनले बानी आजु ढुकले पर चरचा कर लिहल जाव. ढुकल आ घुसल दुनु के मतलब एके जस होला. धेयान दीं एके जस, एके ना. काहे कि घुसल कहला में तनी सीनाजोरी, उदण्डता के झाँस आवत बा. ठीक ओही तरह जइसे देश में घुसपैठियन के जमात छाती ठोक के घुस आइल बा. एह दौरान ऊ सीमा पर घूस दे के आइल, एहिजा अइला क बाद घूस दे के कागज पत्तर, वोटर कार्ड बनवा लिहले स आ ओहनी के अतना बड़हन जमात हो गइल कि अब ऊ घूंसा तान के देश के राजनीतिक गोलन के अपना अँगुरी पर नचावत बाड़े आ राजनीतिक गोलो ओकनीए का भरोसे चुनाव जीते का फेर में लागल बाड़ें. होखे के चाहत रहे कि एह लोग के देश का सीमा में ढुके से रोकल जाव बाकिर जेकरा पर रोके के जिम्मेदारी रहल सेही ओकरा के ढुकवावत गइल आ जिनका पर भरोसा रहे कि ऊ ढुका लागल जायज नाजायज देखत रहीहें आ नाजायजन के कानून का घेरा में ले अइहें उहो आपन काम ना कइलन. मानल जा सकेला कि अतना बड़हन सीमा पर लोग के ढुकला से एकदमे रोक पावल असंभव ना त मुश्किल जरूर बा. बाकि घुसे वालन के त रोकल चाहत रहे जवन हो ना सकल.

सरकारो बार बार भरोसा देले कि अब सैनिक खरीदारी में दलालन के ढुके ना दिहल जाई आ हर बेर कवनो ना कवनो घपला घोटाला सामने आवते रहेला. आजु जब लिखे बइठल बानी त हेलीकाप्टर खरीद के घोटाला के चरचा जोर पर बा. सरकार मूड़ी नववले चुप्पी सधले रहुवे कि एह देश के लोग के कुछ अता पता लागी ना आ मामिला शांत पड़ जाई लोग भुला जाई. बाकिर इटली के सरकार के गलती देखीं कि अपने सरकारी कंपनी के मुखिया के धर दबोचलसि के काहें घूस दिहलें हेलीकाप्टर सौदा खातिर. आ जब इटली सरकार ओकरा के जेल में डाल दिहलसि त अपनो सरकार के साँस उभचुभ होखे लागल बा आ कहल जात बा कि मामिला के गहन जाँच करावल जाई. सभे जानत बा कि ओह भा कवनो जाँच के कवन नतीजा निकले वाला बा. आसमान से पाताल ले हर जगहा ई ढुकल लुकाइल बाड़ें सँ. एकनी के पइठ हर जगहा बा. एगो कहावत ह कि “खैर, खून, खाँसी, खुशी, बैर, प्रीत, मधुपान. रहिमन दाबे ना दबे, जाने सकल जहान.” बाकिर घपलेबाज लागल रहेलें, ढुका लागल, हर सौदा में आपन जोगाड़ बइठावे ला. आ उनुका इहो मालूम बा कि ढुके के ठौर ना मिली त घुसल कइसे जाई. घूस दे के ना त घूंसा तान के. अलग बाति बा कि घूंसा ताने के जरूरत कमे पड़ेला. हर जगहा अइसनका लोग मौजूद बाड़ें जे कुछ ना कुछ घुस ले के ढुकावे ला तइयार बइठल बाड़ें. बस मालूम होखे के चाहीं कि के ढुकवा सकेला.

चलत चलत अब रउरा के इहो बतावत चलीं कि ई ढूका पुराण आजु कइसे याद पड़ गइल? एगो मास्टर साहब एक बेर अपना विद्यार्थियन से पूछले कि “मे आई कम इन” का बदले सबसे कम शब्द में का कहल जा सकेला कि पूरा अर्थ आ जाव. तरह तरह के सुझाव विद्यार्थियन का तरफ से आइल. आ ओह में सबले कम शब्द के, साँ कहीं त एके शब्द के, सवाल रहल कि “ढूकीं?” मास्टर साहब ई जवाब सुनि के गदगद हो गइल रहले. आ आजु उहे कहनिया याद पड़ गइल त हमरा कल पड़ल. ना त आजु के बतकु्च्चन ला कुछ ढुकते ना रहुवे दिमाग में. आ जसहीं कहनिया याद पड़ल हम लगनी ढकचे आ ढेंचू ढेंचू करे.

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(1)
अनुपलब्ध
18 जून 2023
गुमनाम भाई जी,
सहयोग राशि - एगारह सौ रुपिया

(3)

24 जून 2023 दयाशंकर तिवारी जी,
सहयोग राशि - एगारह सौ एक रुपिया
(4)
18 जुलाई 2023
फ्रेंड्स कम्प्यूटर, बलिया
सहयोग राशि - एगारह सौ रुपिया
(7)
19 नवम्बर 2023
पाती प्रकाशन का ओर से, आकांक्षा द्विवेदी, मुम्बई
सहयोग राशि - एगारह सौ रुपिया

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सुतला मे, जगला में, चेत में, अचेत में। बारी, फुलवारी में, चँवर, कुरखेत में। घूमे जाला कतहीं लवटि आवे सँझिया, चोरवा के मन बसे ककड़ी के खेत में। - संगीत सुभाष के ह्वाट्सअप से


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