बतकुच्चन – २६

by | Sep 4, 2011 | 0 comments

मानत बानी कि बरसात के मौसम बा. कहीं कम त कहीं बेसी बरखा पड़त बा. बाकिर एकर मतलब ई त ना भइल कि सड़कि के कादो पाँकि हँचाड़ खोभाड़ि के चरचा हम सबेरे सबेरे शुरु कर दीं. आखिर हर बाति के एगो आपन समय होला. लेकिन देखत बानी कि बतकुच्चन करे वालन के गिनिती बढ़ले जात बा. चारो तरफ आजु बतकूचने हो रहल बा. हालात अइसन बा जइसे कि कवनो लंठ सामने वाला से पूछत होखे कि गठरिया तोर कि मोर, जानत बानी कि गठरिया हमरे ह बाकिर ओकर हाव भाव देख के लागत बा कि अगर कह दिहनी कि मोर त ऊ पहिले कपरवा फोड़ि तब गठरिया छोड़ी. अइसना में हम का, नीमन नीमन लोग के बेंवत ना होई कि कह देव कि गठरिया मोर. आ तब ऊ लंठ बहुते आराम से हमार गठरिया अपना कान्हि पर टँगले चलि दी. बाकिर बाति शुरू कइले रहीं कादो पाँकि हँचाड़ खोभाड़ि से आ ओहिजे लवटत बानी. देश के राजनीति आ सड़कि के हालात दुनु एह मौसम में एके जइसन लागत बा. बाति कादो तक ले सीमित रहीत तबो कवनो बाति ना रहल ह. कगरिया के निकल जाइत आदमी काहे कि कादो थोड़ही दूर ले पसरल रहेला आ पाँकि से गीलो तनी कमे रहेला. बाकिर एहिजा त पाँकिओ के अतना लसारल गइल बा कि हँचाड़ हो गइल बा. हँचाड़ पाँकि ढेर हो गइला पर आ ओकरा से ढेर लोग भा जानवर के अइला गइला से बनेला. आजु के राजनीति हँचाड़ जस हो गइल बा. खोभाड़ि कह देब त कुछ लोग के बाउर लाग जाई, काहे कि सूअर के बाड़ा में बनल हँचाड़ के खोभाड़ि कहल जाला. देखे वाला के भले ऊ खोभाड़ि घिनावन लागत होखे, सूअरन खातिर त उहे स्वर्ग होला. ओहिमें मजा से लोटात पोटात रहेले सँ. राजनीतिओ का खोभाड़ि में वइसहीं लोटाए पटाए वालन के कमी नइखे. बाकिर ओह लोग के हम सूअर ना कहि सकीं काहे कि हमरा आपन विचार अभिव्यक्ति के कतनो अधिकार होखे विशेषाधिकार वालन से हमेशा डर लागेला. एहि से हम करिया कोट भा उज्जर टोपी वालन का खिलाफ कुछ ना बोली. अगर अनजाने में कबो कुछ मुँह से निकल जाव भा लिखा जाव त दोसर बाति बा. अब निकलत बानी एह हँचाड़ से. अगिला अतवार फेर भेंट होखी.

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(4)
18 जुलाई 2023
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(7)
19 नवम्बर 2023
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सुतला मे, जगला में, चेत में, अचेत में। बारी, फुलवारी में, चँवर, कुरखेत में। घूमे जाला कतहीं लवटि आवे सँझिया, चोरवा के मन बसे ककड़ी के खेत में। - संगीत सुभाष के ह्वाट्सअप से


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