भोजपुरी इंडस्ट्री मेरी मां जैसी है : संजय सिन्हा

by | Jun 14, 2018 | 0 comments

मैंने बॉलिवुड को अपने पिता की तरह माना है तो भोजपुरी इंडस्ट्री मेरी मां के जैसी है – यह कहना है फिल्म निर्देशक संजय सिन्हा का.
अगले माह से फ्लोर पर जाने वाली भोजपुरी फिल्म – जिंदगी एगो जंग – के कास्ट चयन के सिलसिले में पटना पहुचे संजय सिन्हा ने कहा कि फिल्म की शूटिंग भले झारखंड में होगी अधिकतर कलाकार बिहार के होंगे.
संजय सिन्हा दर्जनभर टीवी धारावाहिक और फिल्मों में काम कर अपना मुकाम बना चुके हैं हाल में ही उनकी फिल्म पटना सहित पूरे बिहार में रिलीज हुई है जिसका नाम है – पटना वाले दुल्हनिया ले जाएंगे. संजय इसके पहले सुरेश कुमार की फिल्म बिटिया सदा सुहागन रहे, लखेरा, चंपा चमेली, दुल्हनिया ले कर जाए हम जैसे भोजपुरी फिल्मों को दे चुके हैं. कमोबेश इनकी सारी भोजपुरी फिल्में हिट रही है.
फिल्मों में आने के पहले संजय सिन्हा कई वर्षों तक ई टीवी से निर्देशक के रूप में जुड़े रहे है. ई टीवी के कई चर्चित कार्यक्रम की शुरुआत बतौर निर्देशक संजय सिन्हा ने ही की है जिसमें जनता एक्सप्रेस, नारी, कैंपस, दास्तान ए जुर्म आदि शामिल है. पटना दूरदर्शन के लिए तो संजय सिन्हा ने अनगिनत टेली फिल्मों का निर्माण किया है – मल दे गुलाल मोहे, लोक बाहर, टेक इट इजी आदि शामिल है. संजय सिन्हा खुद कहते हैं कि आज उन्हें कई फिल्मों का निर्देशन का मौका मिलता रहा है लेकिन उन्हीं फिल्मों को चुनते हैं जिसमें भोजपुरी की महक हो और जनता उन्हें पसंद करें. इसके लिए वे तकनीकी पक्ष के साथ-साथ स्क्रिप्ट पर बारीकी से ध्यान देते हैं.
संजय सिन्हा का मानना है कि आज भोजपुरी सिनेमा एक बार फिर पटरी पर आ रही है और इस को बढ़ाने के लिए सार्थक फिल्मों का बनाना जरूरी है. अगर वल्गर फिल्में बनती रहे तो दर्शक हॉल तक भी नहीं आ पाएंगे. उनकी दो दो फिल्में अभी फ्लोर पर जाने वाली है. संजय सिन्हा मानते हैं कि बिहार में जो परिवेश होना चाहिए फिल्मों के लिए, वह सरकार मुहैया नहीं करा रही. फिल्म निर्माण के लिए कोई रियायत नहीं दे रही है और ना माहौल बनाने का कोशिश कर रही है. घोषणा तो सरकार रोज करती है लेकिन वर्षों से हम कलाकार इंतजार कर रहे हैं कि राज्य सरकार भोजपुरी सिनेमा के लिए कुछ करें. क्षेत्रीयता के नाम पर सिर्फ बिहार ही पिछड़ा है, अन्य दूसरे राज्य या राज्यों में राज्यों में फिल्म निर्माण फिल्म निर्माण एक उद्योग का रूप ले चुका है. बिहार में जितना दर्शक हैं उतना शायद दूसरी राज्यों में नहीं है. बाहर की फिल्में या हिंदी फिल्में प्रदर्शित कर महाराष्ट्र और दूसरे राज्यों के लोग बिहार और यूपी और झारखंड जैसे राज्यों से खूब कमाई कर रहे हैं लेकिन बिहार के निर्माता निर्देशक और कलाकार सिर्फ उनका मुंह देखते रह जा रहे हैं.


(ब्रजेश कुमार)

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