जिउतिया (जीवित्पुत्रिका) : चिरंजीवी संतान के ब्रत

by | Sep 22, 2016 | 2 comments

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– रामरक्षा मिश्र विमल

(-अबकी 23 सितंबर 2016 के जिउतिया व्रत पड़ल बा. एह मौका पर पहिले से प्रकाशित आलेख कुछ नया चित्र का साथे दुबारा दिहल जात बा. एह चित्रन का साथे विमल जी लिखले बानी कि एह तरह के लेखन आ सामग्रियन के जुटावे आ प्रदर्शित करे के पीछे हमार एकही मतलब रहेला- ओह लोगन तक भोजपुरी संस्कृति के पहुँचावल जे अपना थाती के देखी त एक बार भावुक हो जाई आ अपना बाल-बच्चा के बड़ा उत्साह से अपना भा अपना पुरनियन का अनुभव का साथे जोरिके बताई. काल्हु नेट पर नोनी के सागो खोजला पर लोगन के मिल जाई त हम भोजपुरियन का सङे चिपकल गँवार शब्द के ध्वनि कुछ कमजोर होई.- संपादक)

शास्त्रन में जिउतिया के जीवित्पुत्रिका नाम से जानल जाला. सामान्य रूप से शास्त्रन का अनुसार कुआर (आश्विन) महीना के अन्हरिया (कृष्ण पक्ष) में सप्तमी से रहित अष्टमी के एकर अनुष्ठान कइल जाला.(विशेष स्थिति में शास्त्र-वाणी का हिसाब से निर्णय लियाला.)मेहरारू लोग बेटा खातिर “जिउतिया” से बड़ ब्रत ना मानेलिन. चिरंजीवी संतान खातिर स्त्री लोग एह ब्रत के करेली.

ब्रत के बिधान

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जिउतिया के ब्रत निर्जला आ निराहार रहिके कइल जाला. साँझि खा जीवित्पुत्रिका माई के साथ-साथ कुश के राजा जीमूतवाहन के एगो आकृति बना के पूजन कइल जाला. कई गो स्त्री मिलि के एक साथ पूजन करेलिन. अगिला दिन नवमी में अन्न-जल से पारन कइल जाला. जिउतिया के सँझवत के नहा-खा होला, जब नहा-धो के नीके शुद्ध भइला का बादे बिना प्याज-लहसुन के बिल्कुल शाकाहारी सात्विक खाना खाइल जाला. सँझवते के जइ गो लइका रहेले सन तइ गो ओठघन बनावल जाला आ चूल्ही का जरी ओठँघा दिहल जाला. ओठँघवले का कारन ओकर नाँव ओठघन परल.

आजु के दिन के खास सब्जी सतपुतिया होले. नोनी के साग आ मँड़ुआ के रोटिओ आजु खास करके खाइल जाला. खाए से पहिले चिल्हो-सियारो खातिर सतपुतिया के पतई पर खाना धइके बाहर कहीं फेंड़ का नीचे भा छत पर राखि आवल जाला. पारनो का दिन ई काम कइल जाला. अगिला दिन साँझ खा जिउतिया के कथा सुनला का बाद बरियार के पौधा सामने रख के बरती लोग कहेलिन-“ए बरियार त का बरियार, जाके राजा रामचंद्र से कहिहऽ कि फलाना (बेटा के नाँव धइके) के माई खर जिउतिया कइले बाड़ी, गंगा नहइले बाड़ी, दही भात खइले बाड़ी.”

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ब्रतकथा

एक बेरि नैमिषारण्य में रहेवाला ऋषि लोग संसार का कल्यान खातिर सूत जी से आग्रह कइले कि कराल कलियुग में लोगन के लइका कइसे दीर्घायु होइहें सन एकर कवनो उपाय बताईं. तब सूत जी कहले कि द्वापरो में ईहे सवाल लेके कुछ महिला लोग गौतम जी के पास गइली तब ऊ द्रौपदी के चर्चा करत आपन बात शुरू कइले. गौतम जी कहले कि रउँवा सभसे हम उहे बात कहबि जवन पहिले से सुनले बानी. जब महाभारत युद्ध के अंत हो गइल त अश्वत्थामा का कारन पुत्रशोक से व्याकुल द्रौपदी अपना सखियन का सङे धौम्य मुनि का पास गइली आ बच्चन के दीर्घायु होखेके उपाय पुछली. धौम्य जी कहलीं- सतयुग में साँच बोलेवाला आ सभके एक आँखि से देखेवाला एगो राजा रहन, जेकर नाम रहे- जीमूतवाहन. एक बेर राजा अपना पत्नी का सङे ससुराल गइल रहन. एक दिन आधा रात खा उनुका कवनो मेहरारू के जोर-जोर से रोवे के आवाज सुनाइल. राजा उनुका पँजरा गइले त देखले कि उनकर बेटा मर चुकल रहे. राजा जब कारन कारन पुछले त ऊ बतवली कि एगो गरुड़ रोज आके गाँव के लइकन के खा जाला. राजा से बर्दाश्त ना भइल. ऊ ओहिजा गइले जहाँ रोज गरुड़ गाँववालन के भेजल एगो लइका के खा जात रहे. अगिला दिन राजा अपनहीं गइले. समय पर गरुड़ अइले आ राजा पर टूट परले. जब उनकर बाँया अंग खा गइले त राजा झट से आपन दहिना अंग गरूड़ का ओरि कऽ दिहले. गरुड़ अचरज में परि गइले, पुछले – तू कवनो देवता हवऽ का ? राजा कहले कि रउरा खइला से मतलब बा नू ? मन भर के खाईं, एह तरह के बातन से का फायदा बा ? गरुड़ राजा से प्रभावित भइले आ उनुका कुल खानदान के बारे में पूछे लगले. राजा बतवले कि हमरा माई के नाँव शैव्या आ बाबूजी के शालिवाहन हऽ आ हमार जन्म सूर्यवंश में भइल बा. राजा आपन नाँव जीमूतवाहन बतवले. गरुड़ राजा के दयालुता पर बड़ा खुश भइले आ कहले कि बर माँगऽ. राजा कहले कि हमरा के इहे बर दीं कि रउँवा जतना प्राणियन के खइले बानी ऊ सभ लोग जिंदा हो जासु आ अब से लोग ज्यादा दिन तक जिंदा रहसु. अतना सुनते गरुड़ अमृत ले आवे खातिर स्वर्ग चलि गइले आ अमृत ले आके सभ हड्डियन पर बरिसवले. सब लइका जी गइले सन. तब ओह खुशी का माहौल में गरुड़ जी राजा के एगो अउरी बरदान दिहले – आजु कुआर (आश्विन) के अन्हरिया (कृष्ण पक्ष) में सप्तमी से रहित अष्टमी बा. आजु तू एहिजा के प्रजा के जीवनदान दिहलऽ, एहसे अब से ई दिन ब्रह्मभाव हो गइल बा. अमृत देके जियावेवाली माई दुर्गा के एगो नाँव जीवित्पुत्रिका हऽ. अब से जवन भी स्त्री आजुके दिन जीवित्पुत्रिका माई के साथ-साथ कुश के “राजा जीमूतवाहन के एगो आकृति” बनाके पूजा करी आ अगिला दिन नवमी में पारन करी, ओकर बंश बढ़त जाई आ फूलत-फलत जाई. द्रौपदी जी धौम्य मुनि से एह ब्रत के बारे में सुनिके अपना सखियन का साथे जाके ई ब्रत कइली.

चिल्हो-सियारो के कथा

गौतम जी कहले कि एह ब्रत का बारे में एगो चिल्ही सुन लेले रहे आ ऊ अपना सखी सियारिन के बतवलसि. दूनो एह ब्रत के कइली सन बाकिर सियारिन से भूखि बर्दाश्त ना भइल, ऊ जाके मांस खा लिहलसि. एकर फल ई भइल कि मरला का बाद दूनो के जनम एकही घर में भइल. सियारिन राजा के जेठ बेटी भइलि आ चिल्ही छोट. बड़की के बियाह काशीराज से आ छोटकी के उनुका मंत्री से भइल. बड़ी जानी के जवन भी संतान होखे ऊ मर जाय आ छोट जानी के बाल-बच्चा सुघर-साघर आ सकुशल. ई देखिके रानी के बहुत जलन होखे, कई बेर त ऊ मंत्री के लइकन के मरवावे के कोशिशो कइली, बाकिर नाकाम रहली. अंत में एक दिन उनकर छोट बहिन उनका के पूर्व जन्म के बात इयाद करवली. रानी बहुत पवित्रता का साथ एह ब्रत के कइली आ ब्रत का प्रभाव से उनकर संतान जीवित रहे लगली सन. उनकर कई गो बेटा बड़ होके बड़े-बड़े राजा भइले सन. सूतजी कहलीं कि जवने स्त्री चिरंजीवी संतान चाहत होखे ऊ विधिपूर्वक एह ब्रत के जरूर करे.

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जिउतियाजीवित्पुत्रिका

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2 Comments

  1. रामरक्षा मिश्र विमल

    धन्यवाद।बाकिर सभसे ज्यादा महत्वपूर्ण बाटे प्रतिक्रियात्मक टिप्पणी।
    हमार का भोजपुरी के सभ सेवक के आशीर्वाद आप जइसन प्रतिभाके इंतजार कर रहल बा।

  2. JAIKISHOR SHARMA

    बहुत बढिया सर। रउवा अईसन लोग के कारण हमनी के संसकृति कभी धुमिल ना होई। आवे वाला पिढी भी याद रखी। आशिवार्द दीही के हमनी के आपन संसकृति के साथ आगे बढी सन। प्रणाम

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