– हरेन्द्र हिमकर धरती के रग-रग में भइल राग अदिमी -अदिमी हो गइल नाग डंसलनि समाज के पोर-पोर देहिया-देहिया में लगल आग। अंगे-अंगे धहकल धिधोर धरती लिहली अॅंचरा बिटोर तब धू-धू-धू सब ओर मचल रीसे लागल अॅंखिया करोड़। राजा से रूस गइल रानी होखे लागल खींचा-तानी राजा परजा के मेलपूरा पढ़ीं…

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– जयशंकर प्रसाद द्विवेदी बिला गइल माथा के संतुलन बेगाथा के बौंडियात बानी एनी ओनि सुनाइल एघर से भागल बा ॥ बुझाता ए एनियों लुत्ती लागल बा ॥ भइल बंद हाथ कमाई के पीर उठल जुदाई के घिघियात बानी एनी ओनि बुझाइल ए कुरसी बिना पागल बा ॥ बुझाता एपूरा पढ़ीं…

– डा0 अशोक द्विवेदी सबुर धरीं कबले , हमहन के मत कंगाल करीं साठ बरिस किरसवनी/ अब मत जीयल काल करीं ! नोच -चोंथ के खा गइनी सब / कुछऊ ना बाँचल डर से रउरा पटा गइल सब ,बूझल ना जाँचल पिन्ड छोड़ दीं अब्बो से; मत अँखिया लाल करींपूरा पढ़ीं…

बाॅलीवुड के बड़का स्टार कलाकारन में शामिल आमिर खान के हाल के बयान पर भोजपुरी गायक स्टार आ भाजपा सांसद मनोज तिवारी के बयान आइल बा. लिखले बाड़न कि : हम मौर्या होटल दिल्ली में होखत रामनाथ गोयनका अवार्ड में मौजूद रहनी जवना में आमिर खान आपन विवादित बयान देतपूरा पढ़ीं…

– डाॅ. अशोक द्विवेदी रतिया झरेले जलबुनिया फजीरे बनि झालर झरे फेरु उतरेले भुइंयाँ किरिनियाँ सरेहिया में मोती चरे ! सुति उठि दउरेले नन्हकी उघारे गोड़े दादी धरे बुला एही रे नेहे हरसिंगरवा दुअरवा प’ रोजे झरे बुची चुनि-चुनि बीनेले फूल आ हँसि हँसि अँजुरी भरे; जब उतरेले भुइयाँ किरिनियाँपूरा पढ़ीं…

– रामयश अविकल चलीं ई सबुर के बन्हल-बान्ह टूटल कमाये बदे आज घर-गाँव छूटल। मिलल मार गारी, मजूरी का बदला सरेआम अब आबरू जाय लूटल। भवन तीन-महला शहर में बा उनकर हमन के त झाँझर पलनियो ले टूटल। इहाँ दाल-रोटी चलल बाटे मुस्किल दइब टेढ़ भइले करमवो बा फूटल। दबंगनपूरा पढ़ीं…

– स्व. आचार्य विश्वनाथ सिंह (ई दस्तावेजी आलेख एह खातिर दिहल जाता कि भोजपुरी लिखे-पढे़े में लोगन के सहायक-होखो) भोजपुरी भाषा में उच्च कोटि के साहित्य-रचने करे खातिर ना, ओकर सामान्य रूप से पठन-पाठन करे खातिर आ ओकरा के कलम के भाषा बनावहू खातिर ओकर मानक वर्तनी के निर्धारण आवश्यकपूरा पढ़ीं…

– डा0 अशोक द्विवेदी सुतल बा जागि के जे, ओके का जगइबऽ तूँ ? घीव गोंइठा में भला कतना ले सुखइबऽ तूँ ? बनल बा बेंग इहाँ कतने लोग कुइंयाँ के नदी, तलाब, समुन्दर के, का देखइबऽ तूँ । बा जरतपन के आगि पेट में सुनुगत कबसे उ अगर लहकपूरा पढ़ीं…

– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’ भाषिक, सांस्कृतिक आ बौद्धिक गुलामी एतना ना मेहीं (बारीक) चीज ह कि एकरा गुलाम का पतो ना चले कि ऊ एह सबके कब से गुलाम बा. ई गुलामी ओकरा उपलब्धि जइसन महसूस होला. ओकरा आगे भाषिक अस्मिताबोध के बात कइनी कि ऊ तपाक से बोलीपूरा पढ़ीं…

– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’ वैदिककाल होखे भा पौराणिककाल, ऐतिहासिक काल होखे भा आधुनिक काल, भोजपुरी भाषी जनसमुदाय राष्ट्र अउर राष्ट्र के भाषा-संस्कृति, सम्मान-स्वाभिमान आ उत्थान-पहचान खातिर कवनो तरह के बलिदान देवे खातिर हर घरी हर छन तत्पर रहल बा. आजादी के लड़ाई के दरम्यान भोजपुरी समाज देश के एकतापूरा पढ़ीं…

– डा0 अशोक द्विवेदी हुक्मरानन का खुशी पर फेरु मिट जाई समाज अपना अपना घर का आगा, खोन ली खाई समाज । कर चुकल बा आदमी तय सफर लाखन कोस के घूम फिर के कुछ समय में, का उहें आई समाज ? जुल्म से भा जबरजस्ती ना बसे बस्ती कहींपूरा पढ़ीं…