दिनेश पाण्डेय उहाँ का सँगहीं रहनीं। बइठार रहे त चलीं सउदा-सुलुफ का सँगे कुछ मटरगस्तियो हो जाई, एक पंथ दुइ काज। तय भइल जे किराना बाजार मुँहें चलल जाई, फेरू सब्जीहाट होते हुए लवटि आवल जाई। अब दु अदिमी सँगे चले आ चुप रहे भा एगो बोलते जाय आ दोसरकापूरा पढ़ीं…

Advertisements

डॉ अशोक द्विवेदी ‘कबीर कूता राम का/मुतिया मेरा नाउँ। गले राम की जेंवड़ी/जित खैंचे, तित जाउँ।।’ कबीर उत्तर भारत के अइसन फक्कड़ मौला सन्त रहलन, जे अपना सहज लोकचर्या आ ठेठ बोली-भाषा के कारन सबसे अलग पहिचान बनवलन। उनका कविता में ‘अनुभूत सत्य’ का प्रेम पगल भक्ति के अलावा अगरपूरा पढ़ीं…

गंगा प्रसाद ‘अरुण’ जा हो निझाइल जवानी! एह भरल बसंत के भोरहरिया में इयादो आवे के रहले त रामेटहल काका आ कपार पर चकरघिन्नी खात उनकर कहटर पुरान! असल में अभी निनिआइले रहीं कि सुतले-सुतले सुरता पर चढ़ गइले भोजपुरी के अमर गायक खलील जी अपना पूरा लय-सुर में भोलानाथपूरा पढ़ीं…