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– जेमिन पांचाल

सवाल उठावल गइल बा कि वित्त में स्नातकोत्तर उपाधि वाला मनई खुदरा कारोबार में विदेशी किराना के विरोध कर सकेला जबकि देश के अर्थतंत्र में धन ले आवे के ई पकिया तरीका बा.

त हमार जबाब सुन लीं –

जी हँ, एगो वित्तविद् समुझे ना. ऊ त दोसर सामाजिक आर्थिक पहलू महटियावत बस संख्या आ आँकड़ा से काम चलावेला. बाकि ओकरा ला इहो बहुते खास होला कि नीति के इस्तेमाल में कइसे ले आवल जात बा आ इहो देखल कि दोसर कवन राह हो सकेला जे अर्थव्यवस्था के निकहा तरीका से मजबूती देव.

सबले पहिले त ई जान जाईं कि विरोध विदेशी सामान से भा विदेशी निवेश से नइखे. स्वार्थी तत्व, जवना में मीडिया आ सरकार दुनु शामिल बाड़ी स, जान बूझ के एह तरह के गलत बात फइलावत बाड़ी स. केहू विदेशी निवेश भा विदेशी सामान के विरोध नइखे करत आ कवनो एगो ब्रांड के दोकानो खोले के विरोध नइखे होत.

देखीं त एह सरकार पर भरोसा नइखे कि ई आर्थिक नीतियन के सही तरीका से लागू कर सकेले. अपना एह बात के प्रमाण में हम सरकार के पिछला आठ साल के काम देखा सकीले. अगर खाली नीति बना दिहला से आर्थिक हालात सुधर जाए वाला रहीत त हमनी का एगो स्वर्ग मे रहत रहती स.

एको बेर ई नइखे कहल गइल कि खाद्य उत्पाद, वितरण आ विपणन के मौजूदा इंतजाम चाक चौबंद बा. एहमें अनेके समस्या बाड़ी स, बहुते सवाल बाड़ी स, जवना के जवाब खोजे के जरूरत बा जेहसे किसान के शोषण रोकल जा सके आ वितरण विपणन के स्तर सुधारल जा सके. बाकिर एह ला विदेशी किराना कवनो जवाब नइखे. राज्यन के सहयोग आ ओकरा भण्डार गोदामन के सही इस्तेमाल बेसी जरूरी बा. शोषण रोके खातिर कड़ा कानून बनावे आ लागू करे के जरूरत बा.

जहाँ ले चालीस लाख नया रोजगार बढ़ावे के सवाल बा सरकार के कहना झूठ साबित करे ला तथ्य जानल जरूरी बा कि दुनिया भर में वाल मार्ट में बमुश्किल २१ लाख कर्मचारी काम करेले. एहसे विदेशी किराना से लोग के बढ़िया रोजगार मिले के बात कइल बेकार बा.

जइसे कि पहिले कहले बानी, थोड़ देर ला मानियो लिहल जाव कि दुनु नीति सही बाड़ी स तबहियो एह नीतियन के लागू करावे के जिम्मा एही भठियारा सरकार का हाथ में होखी, जवन बढ़िया से बढ़िया नीति के बंटाधार करे में माहिर बिया. बढ़िया से बढ़िया नीति के सही तरीका से लागूओ करावल जरूरी होले. नीति त बस माध्यम होली स सरकार के नियत पुरावे के. एहसे जब नियते खराब होखी त कवनो नीति बढ़िया बनिए ना सके. आ ओकर बढ़िया परिणाम कबो नइखे मिले वाला.

एहसे विदेशी किराना के विरोध नीति का रूप में नइखे होत, आ हम सोचत हईं कि ई बढ़िया बात बा देश ला, विरोध होखत बा एह ढाँचा का चलते जवना में विदेशी किराना ले आवे के बात कइल जात बा. एह मौजूदा ढाँचा में विदेशी किराना बड़का आफत बनि जाई.

अब आईं स्थानीय उत्पादन खरीदे का बात पर. सरकार बात करत बिया तीस फीसदी खरीद स्थानीय बाजार से करे के प्रावधान के. एह बात के अइसन गोलमोल तरीका से कहल गइल बा कि विदेशी स्टोर स्थानीय व्यापारियन से विदेश से आयातितो सामान एह में खरीद सकीहे स आ प्रावधान ओकरा पक्ष में रही. एह तरह स्थानीय उद्यम के बढ़ावा देबे वाला बात बेमतलब हो जात बा. असल जरूरत एह बात के बा कि प्रावधान में साफ कहल जाव कि एह तीस फीसदी में सिर्फ देश में उत्पादित आ निर्मित सामाने खरीदल जा सकेला. एह ला जरूरत पड़े त तकनीको देबे के, बाहर से ले आवे के, इंतजामो रहे के चाहीं जेहसे कि देश के उद्यम आपन स्तर आ उत्पादन सुधार सकसु.

विदेशी किराना में ५१ फीसदी के भागदारी दे के प्रबंधन पर काबिज होखे के बात के सैद्धांतिक विरोध बा. ई निवेश ४९ फीसदी से कम होखे के चाहीं जेहसे कि प्रबंधन पर विदेशी काबिज ना हो सकसु.

साथ ही स्थानीय दुकानदारनो के बराबर के मैदान दिहल जरूरी बा. यूरोप भा अमेरिका में सरकार अपना लोगन के निकहा सबसिडी देबेली स भा अइसन प्रावधान राखेली स कि विदेशी उद्यम ओह देश के उद्यम के नुकसान ना पहुँचा पावे. अपनो देश में अइसन इंतजाम कइल जरूरी बा.

कवनो बात के एकांगी नजरिया से देखल समुझल ना जा सके. हर बात के ओकरा समग्रता में देखला के जरूरत होला. हम समुझत बानी कि विदेशी किराना के विरोध का बारे में हम आपन बात कह लिहनी. अब एकरा खिलाफ जवन तर्क दिहल जा सकेला ओकर स्वागत बा जेहसे कि बहस आगे बढ़ावल जा सके.

एह लेख के जेमिन पाँचाल के वेबसाइट से अनूदित कइल गइल बा. जेमिन से ट्वीटर पर संपर्क कर सकीलें.

By Editor