Ashutosh Kumar Singh

जिनगी एगो खेल ह. हार-जीत एहू में होखत रहेला. जे हार से सीख लेके जीते के प्रयास करेला, ओकरा जीत जरूर मिलेला. कहल जाला कि जे युद्ध के पंजरा जइबे ना करी ओकर का हार चाहे का जीत. बाकिर आज हम जिनगी रूपी खेल के चरचा नइखीं करे जात बलुक ओह खेल के चरचा करे जात बानी जवना के प्रभाव हमनी के सेहत प पड़ेला. हम ओह खेल के बात करे के चाहत बानी जवना खातिर हर एक लइका-लइकी के मन में एगो उमंग जाग जाला. हम जब लइका रहीं तब हम आ हमार दोस्त सब स्कूल में खेल के घंटी बाजे के पहिलहीं से आपन बोरा आ झोरा लेके तइयार हो जात रहन. स्कूल में लइकन खातिर फूटबॉल आ बैंडमिटन रहे त लइकियन खातिर लफा-डोरी, रिंग(रब्बर के गोला) रहे. एही तरह घरे अइला प हमनी के कई तरह के खेल खेलत रहीं जा. जइसे आइस-बाइस (लुका-छुपी), गुल्ली डंडा, लट्टु, कंचा, कुकुहूक्का, चिक्का, कबड्डी, खोखो, कितकितवा, डेंगा पानी, रूमाल चोर. लइकियन में सबसे लोकप्रिय खेल रहे गोटी. बाकिर धीरे-धीरे समय के साथे-साथे ई सब पारंपरिक खेलन से नया पीढ़ी दूर आ बहुते दूर जा रहल बा. हाल ई बा आज खुद हम कई गो खेलन के नाम भूला गइल बानी. लइकाईं में हमनी के एगो खेल खेलत रहीं जा ओका-बोका. शायद एह घरी के लइका-लइकी सन के एकरा बारे में जानकारियों ना होई. एह खेल में तीन-चार गो लइका बइठ के आपन दूनों हाथ के पांचों अंगुरी के जमीन प राखत रही जा. ओकरा बाद एगो लइका मंतर नीयन कहत रहे- ओका बोका तीन तलोका, लउआ लाठी, चंदर काठी, चंदरा के नाम का, इजई, बिजई पनवा फूलेला, पान-पिपरा पुचुक. अंतिम शब्द जेकरा हाथ प पड़त रहे ऊ आपन हाथ खेल में से हटा लेत रहे. जे सबसे बाद में बच जात रहे ओकरा सब केहू के हाथ से पिटाई खाए के पड़त रहे. एही तरह एगो खेल रहे चिड़ई उड़. जवन एक तरह से लइका सब के दीमाग के तेज-तर्रार बनावे वाला रहे. अइसने रहे एगो बाघ बकरी के खेल. जवन के सोरह गोटिया भी हमनी के कहत रहीं जा. इहो खेल दीमाग के बत्ती जला देवे वाला रहे.
हमार चिंता खाली एह बात से नइखे की पारंपरिक खेल खतम हो रहल बा. चिंता एह बात के लेके बा, एह खेल में जवन अपना पन रहे, दोस्ताना माहौल रहे. ऊहो धीरे-धीरे खतम हो रहल बा. लइकन के माई-बाबूजी ओकनी के घर से बहरी जा के खेले से रोक रहल बा. शायद अपना लइका के नीमन बनावे के उनकर नेक सोच एकरा पाछे काम क रहल बा. बाकिर सांच बात ई बा कि जवना लइका के प्राकृतिक विकास ना होई, जवन समाज में रहले से संभव बा, ऊ आगे चलके देश-दुनिया खातिर का करी. एह घरी क्रिकेट के अलावा अउर कवनो खेले नइखे लउकत. हमरा समझ से क्रिकेट भारत जइसन देश जहवां के अधिकांश लोग अबहियों आपन जिनगी 20 रूपिया रोज के आमदनी में गुजार रहल बाड़न, के आर्थिक प्रगति में बाधा उत्पन्न क रहल बा. हमरा एह बात से हो सकेला कि क्रिकेट के प्रेमियन के मन के ठेस लागे बाकिर हम सांच कहत बानी. तनी रउआ सोची जब क्रिकेट मैच होखेला, तब दिन-दिन भर लोग आपन-काम धाम छोड़ के क्रिकेट के देखे खातिर टीवी से चीपक जालन ना त रेडियो प कंमेंट्री सुने में आपन समय जाया करेलन. एगो अंदाज के हिसाब से अगर मैच के दिने पूरा देश में कम से कम 20 लाख लोग आपन काम-धाम ना कइलस आ उनका काम से जवन उत्पादन होखे वाला रहे ऊ ना भइल, त अइसे में देश के केतना नुकसान उठावे के पड़ल, एकर अंदाजा रउआ लोग खुदे लगा सकत बानी.
हम त लइकन के माई-बाबूजी से ई निहोरा क रहल बानी कि रउआ लोग लइकन के एह तरह के पारंपरिक खेलन के बारे में बताईं. खेले खातिर प्रोत्साहित करीं. ना त टीवी आ सीडी के चक्कर में ऊ गांव-जवार के माटी के ताकत के भूला जइहें. जब उनका इहे ना मालुम होई कि उनका में केतना दम बा त ऊ देश- दुनिया में आपन का दम देखइहें?
हम आपन पाठक लोगन से एगो अउर निहोरा करे के चाहत बानी, रउओ अपना मन के बात हमरा से कहीं, आपन जियरा के हाल हमरा से जरूर बांटी. हम राउर बात के भोजपुरिया मशाल कॉलम के माध्यम से आगे बढ़ावे के काम करब. संगे-संगे रउआ लोगन के सुझावो के इंतजार क रहल बानी.

राउर
आशुतोष कुमार सिंह

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आशुतोष जी के पिछलका आलेख

5 thoughts on “चलीं चलल जाव खेले ओका बोका”
  1. प्रभाकर जी, रवि जी,अमृतांशु जी आ सीमा जी के बहुत-बहुत धन्यवाद. रउआ लोगन के शब्द हमरा के लिखे के प्रोत्साहित करेला. आपन स्नेह बनवले रहीं लोग.
    राउर
    आशुतोष कुमार सिंह

  2. हम त लइकन के माई-बाबूजी से ई निहोरा क रहल बानी कि रउआ लोग लइकन के एह तरह के पारंपरिक खेलन के बारे में बताईं. खेले खातिर प्रोत्साहित करीं. ना त टीवी आ सीडी के चक्कर में ऊ गांव-जवार के माटी के ताकत के भूला जइहें. जब उनका इहे ना मालुम होई कि उनका में केतना दम बा त ऊ देश- दुनिया में आपन का दम देखइहें?……

    एकदम सही बात कहनी रउआँ। आजु की समय में चल डगवा के डागे डुग, ओल्हा-पाती, आइस-पाइस, घोड़कबड्डी, चिक्का, तीनगोटिया, बारहगोटिया, बेलबिझिया आदि कहाँ देखे-सुने के मिलता। एक त ए खेलन से शारीरिक तथा मानसिक विकास भइले की साथे-साथे अपनत्व भी मिले। सब लोग एक-दूसरा से हिले-मिले। इ सब खेल में एक्को पइसो ना लागे कि हई-हई सामान खरीदे के बा। आज त लोग मोट रकम दे के स्पोर्ट कलब ज्वाइन करता, फुटबाल, बैट आदि खरीदता। पर पारम्परिक खेल के महत्व के नइखे समझत जवन फ्री में उपलब्ध बा।।

    वइसे हम भी रउरी बात से सहमत होत इहे कहबि की पारम्परिक खेल की महता के समझीं अउर आज फेर से ए खेलन के सुरुवात करीं।। जय भोजपुरी। जय भोजपुरिया समाज।।

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