पाती के सितम्बर २०१२ अंक प्रकाशित भइल. डाउनलोड कर के पूरा पत्रिका पढ़ीं.

– डा॰ अशोक द्विवेदी

भाषा ऊ हऽ जवन समय से उपजल परिस्थितियन में- हमहन के जिये आ अपना जरूरतन खातिर, एक दूसरा से मिले-जुले, बोले बतियावे लायक बनावेले, जवन घर का भीतर से बहरा ले – विशल जनसमुदाय से जोरेले. अभिव्यक्ति आ संवाद के जरिया इहे भाषा अतीत, इतिहास, परंपरा आ संस्कृति के सचेतन वाहक बनेले. एही से पीढ़ी दर पीढ़ी अपना सामूहिक चेतना संगे चलि आइल जातीय स्मृतियन के खजाना कहाले. पुरखा-पुरनियन का जीवन-संघर्ष के माध्यम रहल ई भष, आदमी का दिल-दिमाग से जरत जातीय-स्वाभिमान के ऊ लौ हऽ, जेकरा अँजोर में ओकर पहिचान लउकेला. हमहन के आदि अन्त आ अस्तित्व से जुड़ल हर सवाल के जबाब ढूंढ़े में भाषा सहायक बनेले.

अपना जियका-जोगाड़; सुविधा आ जरूरत खातिर, क्रिया-व्यापार, रोजगार, व्यवसाय खातिर एगो भाषा, दोसरा भाषा से स्वतंत्रता आ समानता का आधार पर मिलेले. तब्बे आपुसी मेल-मोहब्बत बढ़ेला आ एक दुसरा के जीवन संस्कृति जाने-समझे के अवसर मिलेला. एक दुसरा के भावना आ विचार के आदर के बिना, कवनो भाषा दुसरा भाषा-भाषियन से रिश्ता ना बना सके. जब कवनो भाषा ‘सत्ता’ शक्ति आ वर्चस्व के सहारा लेके, दुसरा भाषा से मिलेले, त ओघरी ओकर रूप आधिपत्य जमावे वाला होला. अंग्रेजी भाषा के साम्राज्यवाद दोसरा भाषा आ लोकभाषा से जनतांत्रिक सम्बन्ध ना बनवलस. ऊ शुरू से ‘उत्पीड़क’ आ ‘वर्चस्व’ बनावे वाली भाषा रहे, जवन दुसरा भाषा- भाषियन के ओछ, हीन आ गुलाम मान के आपन बर्चस्व कायम कइलस. अपना सुविधा, स्वार्थ खातिर, पद, पइसा रोजिगार, नोकरी खातिर लोग अंग्रेजी के सत्ता कबूल कइलस आ ओकरा गुलामी खतिर मजबूर भइल. अंग्रेज आ ओकर पिठ्ठू अंग्रेजी भाषा के महत्व आ शक्ति के अतना बढ़ा-चढ़ा के परोसलन सऽ, जेसे बुझाव कि संसार के सगरो ज्ञान आ तरक्की के सगरी राह एही भाषा में मिल सकेला. ईहो जाहिर कइल गइल कि दोसर भाषा आ लोक भाषा अशिक्षा, अज्ञान, अन्धकार अपमान का सिवाय अउर कुछ ना दी. बस अंग्रेजिये, पिछड़ापन, अज्ञान, अंधकार, गरीबी दूर कर सकेले. ऊहे आधुनिकता आ विकास का ओर ले जा सकेले, सुख-सुविधा पद-अधिकार, आ सम्मान दिया सकेले. हिन्दुस्तान में, दबाव आ दमन का बूता पर अंग्रेज हमन का भाषाई एकता आ सांस्कृतिक चेतना के छिन्न-भिन्न करे के बहुत कोशिश कइलन सऽ.

अइसन ना रहे कि अंग्रेजन के साम्राज्यवादी वर्चस्व के चुनौती आ विरोध ना मिलल. दमन अन्याय, जुलुम आ शोषन का खिलाफ हिन्दुस्तान के कूल्हि भाषा मिलि गइली स. कलकत्ता से भारतीय पत्रकारिता के मशाल जरल, जातीय भाषा का जोर पर राष्ट्रीय आंदोलन के शुरूआत भइल आ उत्तर भारत में राष्ट्रीय नवजागरन क शंख बाजल. फेर अपने भाषा के हथियार बना के अंगरेजी सत्ता का अनेति से लड़ल गइल.

1826 में ‘उदन्त मारतण्ड’ पं॰ युगुल किशेर शुक्ल अउर ‘उचित वक्ता’ (श्री दुर्गा प्रसाद मिश्र) का जरिये एक बेर हिन्दी पत्रकारिता हुंकार भरलस, फेर त पर्चा, पोस्टर, अखबार के जरिया बना के हिन्दुस्तानी भाषा (हिन्दी, उर्दू, मराठी, बंगला, तमिल आदि) अंग्रेजी सत्ता का खिलाफ उठ खड़ा भइली सऽ, सुराज आ स्वतंत्रता खातिर, हिन्दुस्तान बहुभाषा-भाषी रहलो पर एही से एकजुट भइल कि हिन्दुस्तानी भाषा सभन में भईचारा, बहनापा आ एक दुसरा का प्रति समानता के भव रहे. आजादी का बाद अगर अंग्रेजी बनल रहल आ बढ़त रहल त ओकरा पाछा अंग्रेज ना, हमहने के देश के प्रभुत्व संपन्न, साधन-सम्पन्न लोग आ अफसरशही जिम्मेवार रहे. सबके मालूम बा कि जवना हिन्दी के राष्ट्रभाषा बनावे खातिर, ब्रजी, अवधी, मैथिली, आ भोजपुरी, बुन्देलखण्डी, मगही आदि भाषा आपन सबकुछ न्यौछावर कऽ दिहली स, उहो हिन्दी राष्ट्रभाषा ना बनल, अंगरेजी का संगे ओके राजभाषा बनावे के कोसिस जरूर भइल, बाकि आजादो भइला पर अंग्रेजी अउर मजबूत, अउर हावी होत गइल. आजादी के पैंसठ साल बितलो पर लोक सभा में राजभाषा समिति गठित ना हो सकल.

मातृभाषा क माने खाली माई के भाषा ना हऽ, बलुक जवन जनम का साथे, माई-बाप, सगा-संबंधी, परिवार, टोल-महाल, गाँव आ क्षेत्रीय समाज बोलेला; ओके ‘मातृभाषा’ कहल जाला. मातृभाषा के ऊ परिवेश, जौना में लड़कपन बीतल, जवानी चढ़ल, जवना समाज में हमन के भाव विचार आ सोच के अभिव्यक्ति मिलल, ऊ हमन के जाति-जमात आ पूरा क्षेत्रीय समुदाय के भाषा ए दायरा में आवेला. दोसरा शब्दन में कहल जाव त मातृभष में हमन के एक-एक दुख-सुख, खुशी-उल्लास, चिन्ता, विचार प्रगट भइल, जवना का जरिये सोच क दायरा बढ़ल, जवना में हमहन गवली-बजवलीं, हँसलीं-रोवलीं जा, जवना में प्रेम क उद्गार निकलल, दुख-विपत्ति में जवन एक जुट होके लड़े सिखवलस, ऊ मातृभाषा हऽ.

एह भाषा से हमन क जनम-करम जुड़ल बा. फिर ई भाषा दीन-हीन आ पिछड़ल कइसे हो सकेले? जरूर कवनो भेदभाव, कवनो साजिश, कवनो राजनीति बा, तबे नऽ कुछ लोग अपना भाषा-वर्चस्व का जोर पर, हमहन का भाषा से नाक-भउँ सिकोरऽता. अब देखीं, जनगणना में यू॰पी॰, बिहार के मूल भोजपुरी-भाषी लोग मातृभाषा का जगहा- हिन्दी, अरबी आ उर्दू लिखवा देता. हिन्दी-उर्दू त समझ में आवऽता बाकिर ‘अरबी’ ? पछिला जनगणना में जनगणना-मंत्रालय के अधिकारियो हैरान रहलन सऽ बाद में विश्लेषण कइला पर, पता चलल कि यू.पी. बिहार के अति पिछड़ल इलाका क ऊ लोग, जेकर मातृ-पितृ भाषा भोजपुरी अवधी बा, उहां ज्यादा संख्या में मदरसा का चलते, धर्म का आधार पर लगभग साठ हजार लोग, मातृभाषा ‘अरबी’ लिखवा दिहल. एह ममिला में कश्मीरे बढ़िया बा, उहां उर्दू राजभाषा बा, बाकिर बहुसंख्यक वर्ग आपन मातृभाषा कश्मीरी लिखवालेला.

सरकारी फाइलन के आँकड़ा चाहे जवन कहे, पूर्वी यू.पी. आ बिहार के लोग, बलुक बेतिया, चंपारन, झारखण्ड, नेपाल तक भोजपुरी भाषा आ संस्कृति फरत-फुलात बा. दुख एह बात के बा, कि खुद भोजपुरिहा लोगन में अपना भाषा का प्रति गौरव आ स्वाभिमान नइखे. कबीर आदि संतन के भाषा भोजपुरी के आपन सांस्कृतिक विरासत आ विपुल-साहित्य रहला का बादो; अउर मान्यता प्राप्त लोकभषन नियर संविधान के आठवीं अनुसूची में नाँव लिखावे बदे, का-का नइखे करे के पड़त? भोजपुरी क्षेत्र के सांसद आ बड़-बड विद्वान लोग, अपना भाषा के खाली मतलब परले इयाद करेला. ऊ लोग, मातृभाषा त छोड़ीं, राजभाषा हिन्दिये के केतना कदर करेला ?

सांच आ खरा तथ्य ई बा कि हमहन का देश में, सुराज का बाद, ‘साम्राज्यवादी, वर्चस्व’ के भाषा अंग्रेजी के ‘पावर’ आ उपयोगिता घटला के बजाय, अउर बढ़ि गइल बा. संचार-माध्यम के विस्तार- टेलीविजन, इण्टरनेट, यूट्यूब के आगमन का बाद, समाचार चैनल आ अखबारो के ‘भाषा’-संस्कृति अब बदल रहा बा. अंग्रेजी आजुओ संपर्क, संवाद, शिक्षा, जानकारी, क्रिया-व्यापार, रोजगार, व्यवसाय, कैरियर, तरक्की आ ताकत के ताकतवर भाषा बनल बा. ‘भाषा’ पर सोचे-विचारे वाला लोग खुदे एकरा पाछा छुपल कारन आ रहस-भेद जाने खातिर अंग्रेजिये के पोंछ पकड़ले बा. बड़-बढ़ुवा नेता, अफसर सभे ‘रोमन लिपि’ में लिखल हिन्दी पढ़त-बोलत बा, इहां तक कि हिन्दी के प्रोफेसर-विद्वानों लोग ‘अंगरेजी’ के शान में कसीदा काढ़े में गुरेज नइखे करत. अब खाली अगड़े, पिछड़े, दलित, महादलित, अनुसूचित, परिगणित ना हर वर्ग जाति के लोग अपना छोट-छोट अबोध लड़िकन के ‘मातृभाषा’ का बजाय ‘अग्रेजिए’ सिखावल-पढ़ावल पसंद करत बा. आखिर अंगरेजी से ‘फ्यूचर’ आ ‘कैरियर’ जुड़ल बा। अब अंगरेजी के विरोध संभव नइखे, ना शुद्ध हिन्दी बोले के जिद बा. रोजी रोजगार, काम-धन्धा आ सम्पर्क खातिर कवनो भाषा सीखीं, बोलीं; बाकिर अपना मातृभूमि आ मातृभाषा का दिसाईं आँख मून के अपना के, अउर हीन आ तुच्छ मत बनाईं !


(भोजपुरी दिशाबोध के पत्रिका ‘पाती’ के सितम्बर 2012 अंक से)

कुछ त कहीं...

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