हालही मे एगो विद्वान लेखक के पढ़त रहनी. उनुका लेख में सोगहग के चरचा आइल त उहाँ के लिखले बानी कि शायद सोगहग के जनम संस्कृत के सयुगभाग से भइल जवना के मतलब होला दुनु हिस्सा समेत पूरा. बाकिर हमार बतकुचनी सुभाव के एहसे तोस ना मिलल आ लागल खरकोचे. सोचे लगनी कि सोगहग के माने गह अंग से काहे ना लगावल जाव? गह अंग माने कि जवन सगरी अंग के धइले रहे, गहले रहे. आखिर गह के माने होखबे करेला पकड़ल. हथियार के मुट्ठो के गह कहल जाला. आ गहना मतलब होला बढ़िया से पकड़ल. हो सकेला कि आभूषण के गहना एही से कहल गइल होखे कि ऊ अधिकतर औरतन आ कुछ मरदो लोग के गहले रहेला, धइले रहेला, जकड़ेला रहेला अपना मोहपाश में. आदमी जब बेहिसाब खुश होखेला त ओह खुशी से अस जकड़ जाला कि कहाला कि गहगह हो गइल बा. अब गहकी के एहसे जोड़े के चाहीं त कह सकीलें कि ऊ आदमी जे कवनो चीझु बतुस के लेबे, अपना पकड़ में करे, आइल बा एहसे गहकी ह.

अब चलीं सोगहग से कुछ अउर चरचा कइल जाव. जइसे कि एगो राजनीतिक गोल में दू गो गोल अइसन बन गइल बा कि दुनु के सोगहगे चाहीं पार्टी. केहू केहू से तालमेल बिठावे के मूड में नइखे. अब एह सोगहगे घोंटे का फेर में गोल सोगहगे गायब हो जाव, बिला जाव त ओहसे का. बतिया पंचे के रही खुंटवा रहिए प रही वाला अंदाज में बुढ़ऊ माने के तइयार नइखन पचन के राय. पंच फैसला कर के नयका हीरो के जिम्मेदारी सँउप दिहलें त बुढ़ऊ फनफना उठले, आखिर भर उमिर जवना सपना का आस में बिता दिहलें तवन आखिर घड़ी में काहे छोड़सु आ खासकर के तब जब सिकहर अब टूटल तब टूटल का हाल में. बिलाई का भागे टूटल चाहत बा तबले आ गइलन ई दोसर जने ओह हाँड़ी के दही चाटे.

बाकिर ई सिकहर का ह? ई बतवला से पहिले एगो कवि के कविता के कुछ लाइन दोहरावल चाहब. अनन्त देव पाण्डेय अनन्त लिखत बानी कि,

“ढेंका जाँत कहाँ चलि गइलें, ओखर मूसर कहाँ परइलें, होत भोरहरी में घम घम घम, चिउरा कहीं कूटाते नइखे, गउवाँ गाँव बुझाते नइखे. कोठिला कोठिली ले कगरइलें, डोका डोकी कहाँ हेरइले, झाँपी मोन्हीं कुरूई खातिर, बरुआ कहीं बन्हाते नइखे, गउवाँ गाँव बुझाते नइखे. कुण्डा छोंड़ नाद आ गगरी, मेंटा पूरा दुदहँड़ सगरी, हाँड़ी परई घरिया दियरी, भरुका आज गढ़ाते नइखे, गउवाँ गाँव बुझाते नइखे.”

देखलीं कवि जी कतना शब्द एहमें बता गइनीं. बहुत कमे लोग होखी जे एह शब्दन के मतलब बता सकी. काहे कि जवन चीझ होखबे ना करी तवना के देखब जानब कइसे? एहिसे कुछ शब्द बिलात रहेली सँ आ कुछ गढ़ात रहेली सँ. भाषा जीयत रहेले आ शब्द बदलत रहेलें. आ अब त भोजपुरी भासो पर संकट आइल चाहत बा. हवा बान्हे वाला लोग भलही कहत फिरे कि मारीशस, त्रिनिडाड समेत बीसन देश में भोजपुरी बोलाले बाकिर सचाई त इहे बा कि मारीशस आ त्रिनिदाद में एकर कवनो मोल नइखे रह गइल. आखिर भोजपुरी जान पढ़ के होखी का जब एकरा से कवनो नौकरी नइखे मिले वाला, पेट नइखे पोसाए वाला?

त भोजपुरी सोगहगे बिला मत जाव एहला पूरा समाज के लागे के पड़ी. अबहीं त हाल ई बा कि सोगहग के कुछ लोग सोझहग कहि दी तबो केहू काटी ना. काहे कि काटे खातिर जाने के पड़ी सोगहग भासा.

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2 thought on “भोजपुरी सोगहगे बिला मत जाव (बतकुच्चन – ११६)”
  1. कई-कईगो लमहर, पोढ़गर, सोगहग ऊँखी एक्केलगतारी खइले के मजे कुछ अउर होला। सोगहग के सुन्नर अउर तर्कसंगत बखान खातिर साधुवाद।।

  2. सोगहग पर एगो सोगहग आलेख … खूब भैया
    पाण्डेय जी कविता राउर सोगहग विचार के पूरा कर रहल बिया –

    “ढेंका जाँत कहाँ चलि गइलें, ओखर मूसर कहाँ परइलें, होत भोरहरी में घम घम घम, चिउरा कहीं कूटाते नइखे, गउवाँ गाँव बुझाते नइखे. कोठिला कोठिली ले कगरइलें, डोका डोकी कहाँ हेरइले, झाँपी मोन्हीं कुरूई खातिर, बरुआ कहीं बन्हाते नइखे, गउवाँ गाँव बुझाते नइखे. कुण्डा छोंड़ नाद आ गगरी, मेंटा पूरा दुदहँड़ सगरी, हाँड़ी परई घरिया दियरी, भरुका आज गढ़ाते नइखे, गउवाँ गाँव बुझाते नइखे.”

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