महाकवि रंगपाल केे रचनात्मक अवदान के चरचा कइलसि गोरखपुर के भोजपुरी संगम

by | Mar 12, 2024 | 0 comments

गोरखपुर भोजपुरी संगम केे 169 वीं ‘बइठकी’ 66, खरैया पोखरा, बशारतपुर में चंद्रगुप्त वर्मा ‘अकिंचन’ केे अध्यक्षता अउर अवधेश ‘नंद’ के संचालन में कइल गइल.

बइठकी के पहिलका सत्र में भोजपुरी के सेसर कलमकार फाग कवि रंगपाल जी के याद करत उनुका रचनात्मक अवदान के चरचा भइल.चरचा के शुरुआत में नर्वदेश्वर सिंह ‘मास्टर साहब’ के लिखल आलेख पढ़त डॉ.विनीत मिश्र सुनवलन कि भारतेंदु हरिश्चंद्र जी के दीहल उपाधि ‘महाकवि’ से विभूषित रंगपाल जी पर डॉ.मुन्नीलाल उपाध्याय, डॉ राधेश्याम द्विवेदी, डॉ.सुधाकर दुबे आदि अनेकेे विद्वान शोध कई के उनुका के सम्मान दिहले बाड़न. महाकवि रंगपाल जी भोजपुरी फाग के बहुते कालजयी रचना रचलेे बानी जवना बिना फगुआ के रंग आजुओ फीके लागेला. सगरी दुनिया महाकवि के फाग गीतन पर आजुओ झूमल करेले.

रंगपाल के ‘फगुआ के अगुवा कवि’ बतावत अवधेश ‘नंद’ कहलन कि फाग के जन-जन लेे चहुँपा के ढोल-मजीरा का साथे गावे ला विवश करा देबे वाला महाकवि के नाम रंगपाल ह. बैसवारा, उलारा, चौताल, यती, रंगफाग, रसफाग वगैरह फाग के सगरी विधन पर उनुकर आधिपत्य रहल बा. फाग का अलावा देशभक्ति, खेमटा, दादरा, कजरी, सोहर, तितला, ठुमरी अउर झपताल वगैरह अनेके लोक विधन में उहाँ के रचनन के बखार से भोजपुरी साहित्य समृद्ध बा.

हमेेशा का तरह बइठकी के दुसरका सत्र में कवि लोग आपन-आपन फागुनी रचना सुना के रंग बरसावल.

गोपाल दुबे प्रार्थना कइलन –

लिखले गवले कऽ बा नाहीं लूर हो,
दे दऽ सहूर माई शारदा!

डॉ.बहार गोरखपुरी आपन भोजपुरी ग़ज़ल सुनवलन –
आइल आन्हीं, उड़ा के हजार ले गइल,
सगरो छप्पर आ छान्ही उजार ले गइल.

नंदकुमार त्रिपाठी के कविता जिनिगी पर शोध रहल –

आपन न बा, सब आन बा, एह रात के न बिहान बा,
उड़ि जा ए पंछी खुला गगन, ई जिनगिया केकर भइल ?

रामसमुझ ‘सांवरा’ के कविता मेें निर्मल भावना के रंगीन फुहार रहल –

दुइ पुड़िया रंग घोरलें, एक बल्टी पानी,
फगुनवा में देवरु करें छेड़खानी.

अवधेश ‘नंद’ के छंद बइठकी के उपलब्धि जइसन रहल –

झकझोरति, झूरति, झारति बा, झनकावति माथ इ सीति बेयारी,
तन तोरति, ताकति, झाँकति बा, कुल्हि भॉंपति बा, जीउ देति बा जारी.

वागीश्वरी मिश्र ‘वागीश’ माहौल में मादकता बिखेर दिहलन –

तन चंचल बा, मन चंचल बा, चंचल चले बयार,
अंग-अंग तोरा चूवे महुआ, चूवे लार हमार.

चंदेश्वर ‘परवाना’ के गीत बइठकी के ऊंचाई दिहलसि –

गोरी सुनि के न हो, गोरि सुनि के गवनवा के दिनवा,
अकिलि घबराइल.

डॉ.फूलचंद प्रसाद गुप्त भोजपुरी के उत्तम दोहन से समृद्ध कइलन –

अबकी सम्मति में जरल, निरहू नवकी छान्हि.
सम्मति में सम मति कहाँ, अकिलि गइलि बा बान्हि.

स्व. सत्य नारायण मिश्र ‘सत्तन’ के कालजयी छंदन के सरस पाठ कुमार अभिनीत कइलन –

भेंट करै क चपेट करै, पछुआ पिछिआवत कंत बुझाता,
अंग उमंग लसै जे भुजंग, बसे मन रंग बसंत बुझाता.

बइठकी में चंद्रगुप्त वर्मा ‘अकिंचन’, अरविंद ‘अकेला’, निर्मल कुमार गुप्त ‘निर्मल’ के रचनो सराहल गइली सँ.

रवींद्र मोहन त्रिपाठी आ सृजन गोरखपुरी के विशेष उपस्थिति से समृद्ध बइठकी के आभार ज्ञापन संरक्षक इं. राजेश्वर सिंह कइलन.

आखिर मेेें कवि भीम प्रसाद प्रजापति के माता श्रीमती ठगनी देवी के निधन पर 2 मिनट के मौन राखत उनुका के श्रद्धांजलि अर्पित कइल गइल.

(हमेेशा का तरह भोजपुरी संगम के प्रसार प्रभारी सृजन गोरखपुरी द्वारा हिन्दी में भेेजल सामग्री के भोजपुरी अनुवाद कई केे परोसलेे बानी. काहेें कि भोजपुरी के बड़का लोग आपन बाति हिन्दी में सुनावल पसन्द करेेला. भा हो सकेेला कि हिन्दी मेें त कई अखबारन में छपवावे के होला, भोजपुरी मेे त बस अंजोरिए नू बा ! – संपादक, अंजोरिया.)

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(3)


24 जून 2023
दयाशंकर तिवारी जी,
सहयोग राशि - एगारह सौ एक रुपिया


(4)

18 जुलाई 2023
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(7)
19 नवम्बर 2023
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सहयोग राशि - एगारह सौ रुपिया


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