Prabhakar Pandey

– प्रभाकर पाण्डेय

चुनाव आ गइल बा. आ का गइल बा, सुरुओ हो गइल बा. कुछ जगहन पर जनता के भागि ओटहिया मसीन में बंद हो गइल बा. चुनाव क पहिले नेता, देस अउर जनता, सबका सोझा बहुते सारा मुद्दा रहे. ए मुद्दन में देस, समाज का सोझा सुरसा जइसन मुँह फइलवले खड़ा कुछ भारी-भरकम समस्यो रहली सन. अगर ए समस्यवन पर समय रहत धेयान ना दिआई त उ दिन दूर नइखे जब भारत के अस्तित्वे पर, एकरा संस्कृतिए पर दाग लागि जाई. चुनाव सुरु भइले क पहिले कुछ मुद्दन के जनता क साथे-साथे मीडियो जोर-सोर से उठावति रहली ह अउर नेता लोगो ए में बँधत नजर आवत रहल ह लोग. एसी में बइठिओ के ओ लोगन के पसीना आ जात रहल ह. एइसन लागत रहल ह कि नेता लोगनो के पता चलि गइल बा कि ए बेरी जनता अपना मताधिकार के सही प्रयोग करी अउर ओही के चुनी जे वास्तव में जीत क लायक होई.

पर जवनेगाँ हरदम होत आइल बा, भारतीय राजनीति में, धीरे-धीरे इ मत दिवअइया लोग खेमा में बँटल सुरु हो गइल लोग. मुद्दा एकदम से गौन हो गइनेसन अउर जातिवाद, छेतरवाद, पारटीवाद आदि हिलकोरा मारे लागल. नउबत त इहाँ तक आ गइल कि सही के चुने के मन बना चुकल जनता, नेता के ले के आपसे में कटे-मरे लागल. मीडियो मुद्दन से भटकि के आपन टीआरपी बढ़ावे क चक्कर में के, के के गरिआवता, कवनेगाँ गरिआवता, का पहिनता, कहां-कहां रैली बा, रैली क ए गारी-गारा में जनतो के मीडिया सामिल क के समाज के असली मुद्दन से भटकवले में एकदम से नेतही अवतार में आ गइल अउर जनतो एहमें एकदम से साथ निभवलसि अउर निभावतो चलि जातिया.

खैर जनता भले नेता के दोस देव, अधिकारिन के दोस देव, परसासन के दोस देव पर सही माने में देखीं त ए सब के जिम्मेदार जनता खुदे बिया. जनता के जब बारी आवेला त खेमन में बँटत में देरी ना करे, कवनो-ना-कवनो झंडा क नीचे आके नेतही अंदाज में भासन देबे लागेले अउर चुनाव खतम होतही अपना गलती पर पछताले ना, बलुक रोवल सुरु क देले, परसासन के गरिआवल सुरु क देले, अउर मन में अपना के सांतवना देले कि फेरु चुनाव आई अउर ए लोगन के सबक सिखाइब. पर का अगिला चुनाव में उ सही के चुनाव क पावेले?

हम अगर कुछ लाइनन में चुनाव का मद्देनजर जनता के देखे के, समझे के कोसिस करेनीं त हमरा सामने जनता के इहे रूप अवतरित होला –

उ कतल करे जानें, तब्बो फूल बरसावे ले जनता,
जब होला हमार कतल, थपरी बजावे ले जनता.
जनता बदलल चाहे ले देस के, नेतन के,
पर खुद कबो बदलल न चाहे ले जनता.
मत लगावऽ झूठ-मूठ के आरोप नेतन, अधिकारीन पर,
काहेंकि हर जुलुम में साथ खड़ा लउके ले जनता.
के कहता कि जाति, धरम क नाव पर नेता लोग बाँटि रहल बा देस के,
आँखि खोलिं के देखले पर, खुदे बँटत, बाँटत नजर आवेले जनता.

त कुल मिला-जुला के हमार इ कहनाम बा कि जवलेक जनता ना बदली तवलेक ना नेता बदलीहें न देस. कबो कवनो एइसन नेता ना आई जवन समाज, देस के कल्यान, विकास क बारे में गहराई से सोची. त अब्बो देर नइखे भइल, जाति-पाँति, भाई-भतीजावाद, छेतरवाद आदि से ऊपर उठीं अउर सही के चुनाव करीं, देस हित में अपना मताधिकार के प्रयोग करीं. देस के एगो स्थायी सरकार देबे के कोसिस करीं ना त खिचड़ी सरकार बनते सब-कुछ गुड़गोबर हो जाई अउर फेनु से जनते पीसल जाई. एगो अइसन सरकार ले के आईं जवन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देस के मजबूत क सको, एकर खोवल मान-सम्मान वापस ले आ सको. आतंकवाद आदि के जड़ से उखाड़ फेंको ताकि रउआ मंदिर चाहे मस्जिद चाहे गिरजाघर आदि में आराम से प्रार्थना क सकीं, आराम से अपनी देस में टरेन, बस आदि के सफर क सकीं, माँ-बहिन क घर से निकलले का बाद वापस अवले ले परान शंका में मति रहो. रउआँ कम से कम रूखा-सुखा जवने घर में बा आराम से खा सकीं. अगर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देस मजबूत होई त हमरा पूरा विस्वास बा की बहुत सारा राष्ट्रीय समस्यवन के अंत अपनी आपे हो जाई.

जय हिंद.

By Editor

कुछ त कहीं...

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