अंगरेजन का समय में त भोजपुरी के सम्मान मिलत लउकल बाकिर आजादी के बाद से एकर दसा ढंङ से गड़बड़ाइल ह.

गोरखपुर में भोजपुरी संगम के इकतिसवीं बइठकी के अध्यक्षता करत ई बाति डा॰ आद्या प्रसाद द्विवेदी जी कहलीं. उहाँ के एगो उदाहरन देत बतवलीं कि गोरखेपुर के रहे वाला मन्नन द्विवेदी गजपुरी जी भोजपुरी के सरवरिया भासा कहस. सन् १९२० में जब गजपुरी जी बलिया में कानूनगो रहलीं तब सरवरिया नाम के एगो पत्रिका निकालत रहीं जवन सन् १९३२ ले छपल. ओ घरी एह पत्रिका के आई॰सी॰एस॰ परीक्षा के पाठ्यक्रम में सामिल कइल गइल रहे. जेकरा कलक्टर बने के रहे ओकरा ई पत्रिका पढ़हीं के परत रहे काहें से कि एहमें से प्रश्न जरूर पुछाउ.

हर महिन्ना के दुसरका अतवार के होखे वाला गोरखपुर के भोजपुरी संगम के ई बइठकी एह बेर ओम धीरज जी के घरे भइल रहे. एकरा पहिला सत्र में “भासा के दिसाईं भोजपुरी के जतरा” बिसय पर चरचा भइल रहे.

बतकही शुरू करत मेजबान औम धीरज कहनीं कि अपनी कमाई के बड़ हिस्सा खरच क के हमनी का अपना लइकन के कानवेंटि संस्कार देहल में भिड़ल बानी जा आ एइजा बन्द कोठरी में बइठि के भोजपुरी पर भासनबुकाता. उहाँ के ईहो कहलीं कि आजु सगरी बोलियन के जो त भासा के दरजा दिआ जाव त जनगणना के टाइम पर हिन्दी के मातृभाषा कहे वाला केतना लोग बची आ तब राजभाषा आ राष्ट्रभाषा हिन्दी के का दसा होई?

भोजपुरी के हिन्दी के हिस्सा बतावत रुद्रदेव नारायण श्रीवास्तव बतवलीं कि धनी मनी इलाका के बोली भासा बन सकेली जइसे पंजाब.

रवीन्द्र श्रीवास्तव जुगानी जी भोजपुरी के जतरा कबीर से सुरु बतावत कहली कि दू किताब पढ़ के तिसरकी के रचना क देबेवाला साहित्यकारन से भोजपुरी के भला नइखे होखे के. उहाँ के कहलीं कि भोजपुरी मे अलिखित साहित्य के अकूत भंडार बा जवना के सहेजे खातिर कठिन परिश्रम के जरूरत बा. राष्ट्रभासा आ राजभासा के बहाना ले के भोजपुरी के विरोध करे वालन के जुगानी जी संविधान के आठवीं अनुसूची के अनुच्छेद ३४३ से ३५१ ले आ ३८४ निहारे के सुझाव दिहलीं, जवना में अंगरेजी के सब भारतीय भसन के विधिक निर्देशक जइसन बना दिहल बा.

बतकही में भागीदारी करत प्रो॰ जनार्दन जी समाज के उन्नति कातिर भोजपुरी भासा के उन्नति जरूरी बतावत कहलीं कि कवनो समाह से नजदीकी त तब्बे बनावल जा सकी जब ओकर भासा बोली जानत रही. हिंदी से जेकर रोटी चलि रहल बा ऊ भौजपुरी के विकास के खतरा बूझि रहल बा जबकि अइसन कवनो बाति नइखे.

प्रो॰ आर॰डीऌराय के विचार रहे कि कवनों बोली अपने समर्थ आ टिकाऊ साहित्य के बले भासा बनेले. भोजपुरी सेवी मनीसी लोग अइसन साहित्य दे देले बा लोग. अइसे त भासा हो गइला के बाद कविता, कहानी, उपन्यास आ नाटकन त प्रवाह बढ़िए जाला. प्रो॰ राय के कहे के हिसाब से भासा के दर्जा नाहियो दियइला पर भोजपुरी के दुनिया के नक्शा से मिटावल संभव नइखे.

एह बतकही में चरचा के समेटय सूर्यदेव पाठक पराग जी बतवलीं कि “भारत के भासा सर्वेक्षण” में सबसे पहिले सन १७८९ में डा॰ ग्रियर्सन एकरा खातिर भोजपुरिया आ भोजपुरी शब्द के प्रयोग कइलन. पराग जी बतवलीं कि भोजपुरी के पहिलका व्याकरण सारन जिला के कलक्टर जॉन बीम्स लिखले रहले. १८६७ में एह बोली के भासा कहत जऌन बीम्स एगो लेख लिखले जवना के एशिायटिक सोसाइटी में पढ़ल गइल रहे. उहे लेख १८६८ में ओह सोसाइटी के जर्नल में छपलो रहे.

बइठकी के दुसरे सत्र में ओम धीरज, रुद्रदेव नारायण, फूलचन्द गुप्त, त्रिलोकी तिवारी चंचरीक, हरिवंश शुक्ल हरीश, धर्मेन्द्र त्रिपाठी, अरविन्द, आचार्य ओम प्रकाश पाण्डेय, धर्मदेव सिंह आतुर, राम सुधार सिंह, आ राजकुमार सिंह के काव्यपाठ भइल. श्रीधर मिश्र, रवीन्द्र मोहन त्रिपाठी, अभिजीत शुक्ल, केशव पाठक सृजन, अंगद कुमार सिंहो चरचा में सामिल भइल लोग.

तिसवीं बइठकी

पिछला महीना के बइठकी १२ अगस्त २०१२ के मोहल्ला खरैया पोखरा, बशारतपुर में रवीन्द्र प्रताप सिंह जी के घरे भइल रहे जवना के अध्यक्षता प्रो॰ जनार्दन जी कइले रहीं.

बइठकी गिरिजाशंकर राय गिरिजेश, सूर्यदेव पाठक पराग, धर्मदेव सिंह आतुर, नरेन्द्र कुमार शर्मा, अवधेश शर्मा सेन, राजकुमार सिंह, ओम पाठक आ अंजू शर्मा जइसन कवियन आ साहित्यकारन से भरल पूरल रहल. भोजपुरी संगम के संरक्षक राजेश्वरो सिंह जी एह बइठकी में भागीदारी कइलीं. सभ केहू आपन आपन रचना आ विचर दीहल.


(गोरखपुर से सत्यनारायण मिश्र सत्तन के भेजल रपट)

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