– अभयकृष्ण त्रिपाठी

खइले रहीं कसम अब कलम ना उठाएब,
सबसे पहिले मन के अन्धकार मिटाएब.

दिन बीतल युग बीतल बीत गइल हर काल,
मोहमाया के चक्रव्यूह के नाही टूटल जाल.
खाली हाथ जाए के बा पर गठरी ठूस रहल बानी,
झूठा शान खातिर अपनन के लहू चूस रहल बानी.
बाबू माई से अलगा के किस्सा कइसे करीं बखान,
खइले रहीं कसम अब कलम………. .

बुरा जो देखन के दोहा खुद पर फिट बा,
हमार साथ पाके अन्ना के अनशन हिट बा.
अपना अपना स्तर पर हेर केहू भ्रस्ट बा,
छोटका चोरवे बड़का चोर से त्रस्त बा.
आपन करनी जग के सामने काहे गिनाएब,
खइले रहीं कसम अब कलम………. ।

कुछ त कहीं...

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