– डॉ अशोक द्विवेदी

‘‘पहिले में आ आजु में एगो मूलभूत अन्तर ई आइल बा कि अतीत में,अत्याचार के नायक होत रहे. पृथ्वी पर संत्रास – शोषन के वातावरण लउके त, ई मालूम रहल करे कि एकर करवइया के बा ? कर्त्ता का मालूम रहला के कारन के नष्ट कइल आसान होत रहे !

आजु उल्टा बा. आजु पीड़ा बा, कुण्ठा बा, उत्पीड़न बा, असंख्य बुराई बा. दिल के दौरा पड़त बा, मानव मछरी नियर उलट जात बा. दाँत पीसत-पीसत मुँह टेढ़ हो गइल, बाकिर एह मानसिक तनाव के ऊर्जा स्रोत कहाँ बा? मालूम नइखे ! आजु पृथ्वी पर विद्यमान शासन- व्यवस्था बड़ी तेजी से बदल रहल बा. ईहो हो सकेला कि काल्ह सउँसे संसार एक आदमी का मुट्ठी में आ जाय आ ईहो सम्भव बा कि एक- एक गाँव में एक -एक गो राष्ट्रपति बइठ जासु !

भारत में त जातिए राष्ट्र होखे वाली लागति बा ! हरेक जाति में राष्ट्रपति पैदा हो गइल बाड़न ! खाली भूमि के बँटवारा आ अधिकार के स्थापना भर विलम्ब बा. हो सकेला मानवता विज्ञान से तंग आके, ओहके नष्ट कइ दे आ फिर लाठी -गोजी का समय में लवटि जाय !’’

– आनन्द सन्धिदूत ( 1992 , पहिल काव्य संग्रह ‘एक कड़ी गीत के’ के भूमिका में )

आजु राष्ट्र आ ओकरा चेतना के लेके जइसन राजनीतिक वातावरण बनल या बनावल जा रहल बा, ओके लेके सोचल-बिचारल, साहित्य लिखे-पढ़े आ ओपर आलोचन-विमर्श करे वाला रचनात्मक ( बुधिगर – संवेदनशील,सुधी – सहृदय) लोगन के जिमवारी बा. कवि अपना समय सन्दर्भ का साथे-साथ भविष्य देखेला आ आपन रचनात्मक जिमवारी समझि के, ऊ समाज के सचेतो करेला. एह दिसाईं, आनन्द सन्धिदूत खलिसा भोजपुरिए के ना, अउरियो भाषा-समाज लाएक बिचार, आजु से चार दशक पहिले,1992 में प्रगट कर चुकल बाड़न.

राजनीति, अपना स्वारथ आ सत्ता-लिप्सा में कवन आ कइसन अधातम ना करवावे ! ऊ आपुस में झगरा करवावेले, जातीय उन्माद पैदा करेले, मरवावे-मुआवे तक के साजिश रचेले, ओकरा खातिर राष्ट्र भा देस ले ऊपर ओकर आपन सत्ता, आपन वर्चस्व महत्व राखेला. पुत्र-पुत्री,भाई-भतीजा आ रिश्तेदार से ऊपर चढ़ि के जातीय गोलबन्दी के गुणा-गणित करत ऊ समाज के आपुसी मिल्लत आ मानवी नेह-नाता के छिन्न-भिन्न करे में तनिको ना हिचकिचाय !

आजु देश में अइसने स्थिति बनावल जा रहल बा ! बड़की सत्ता पावे भा कब्जियावे वाला ध्येय के पूर्ति खातिर, राष्ट्र आ राष्ट्र हित चिन्ता के बलि चढ़ाइ के, कहल गइल उक्ति — ‘सर्वजन सुखाय-सर्वजन हिताय’ वाला सगरो मान-मूल्य बदलल जा रहल बा. फेरु एक बेर अन्ध-सपन-लासा का जातीय गोलियाँव वाला उन्मादी पाँसा फेंकल जा रहल बा. उपराँ अपना कथन में, आनन्द सन्धिदूत एही ‘लाठी – गोजी’ का समय का ओरि इशारा कइले बाड़े !

भोजपुरिया लोक आ ओकर मन ‘परहित’ के धरम वाला हवे, ‘परपीड़न’ के अधम करम मानत ई लोक अपना संसार में च्यूँटी- चिरई सबकर चिन्ता करेला ! कम्मे सही, ढेर लोग अबहियों बाड़े, जे ऊर्जा के दाता सुरुज नरायन के विनय भाव से जल ढारेले, गांछ-बिरिछ, जलसोत, नदी, पहाड़ हरेक दाता का आगा माथे नवाइ के कृतज्ञ भाव परगट करेले. त का एह लोक के मूल सोभावे बदलि जाई ? सरब हित का बजाय, खाली आपन हित सोचाई ! उपभोगवादी कथित पच्छिमी प्रगतिशीलता-आधुनिकता में, एह लोकसंबेदन का लतर के झउँसि दिहल जाई ? एकर माने ई होई कि भौतिक पद, सुख-सुबिधा भोगे वाला, बिघटन के बीया बोवे वाला एह राजनीतिक नेतवन के जीत हो जाई !! अधिकार आ भूँइं पर कब्जा खातिर सब आपुसे में कटि-मरि के स्वाहा हो जाई ?

उत्सव-संस्कृति आ स्वस्थ जीवन-परम्परा वाला एह लोक के बनाव-बिनाव के तूरे आ छिया-बिया करे वाला, खुदे बहि -बिला जइहें स’, हम त ईहे मनाइब ! सिरजन करे वाला के जय आ बिधंस के बीया बोवे वालन के पराजय होखे ! सुधी, सहृदय, संबेदन से भरल गुनी -ग्यानी , साहित्य -कला- कर्मी लोग त अरथवान भाव-सन्तुलन आ सुघराई के संयोजन करेला — पृथिवी का हर रूप-कुरूप, अरूप पर सोचे -बिचारेला , ओकर चित्र उरेहेला. रचनाधरमी खातिर संसार में, जेतना फूल पतई जरूरी बा, ओतने काँट-कूस.

मीठ-तीत फल का साथ-साथ, प्रकृति भाँगो-धतूर पैदा कइले बिया ! प्रकृति का एह भाव-मुद्रा आ सन्तुलन में रचनात्मकता छिपल बा ! पृथिवी आ प्रकृति के भावलोक में जनमे-जिये वाला हर जीव के विशेषता आ महत्व बा ! सबके मिलाइये के सम्पूर्णता बनेले ! कवि -लेखक के दृष्टि भेद-भाव वाली ना होखे के चाहीं. स्वतंत्र चेता ऋषि, सन्त आ कवि सुभावे से संबेदनशील आ लोकधर्मी होला — जड़ता , अज्ञान, अन्याय, शोषन आ अमानवीय सत्ता-व्यवस्था के आलोचक आ विरोधी होला ! ऊ कवनो खूँटा से बन्हाय ! आनन्द के कवि कवनो ‘वाद’ पन्थ आ ‘खेमा’ से बन्हाइल ना रहे !

एही से उनका कविता आ लेखन में लोकधर्मी आस्था, विश्वास, जीवन-संस्कृति का साथ साथ जड़ता, नकारात्मकता, अन्याय आ शोसन का खिलाफ बेबाक प्रतिरोधी स्वर बा ! एह अंक में (भोजपुरी दिशाबोध के पत्रिका पाती के 102-103वाँ अंक) दिहल गइल उनका रचना-संसार के झाँकी आप सभके अपना भाव-लोक में उतरे खातिर न्योतत बा !



अँजोरिया संपादक का ओर से क्षमायाचना कि अबकी बेर पत्रिका के हर रचना अलग से डाले में दिक्कत आ रहल बा. पूरे पत्रिका रउरा डाउनलोड क के पढ़ लीं. कारण बा हमार लैपटॉप साथ नइखे देत.

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