पाती के नयका अंक बेहतरीन कागज पर बढ़िया सफाई का साथ प्रकाशित भइल बा. बाकिर कुछ तकनीकि गलती से एकर सूची वाला पन्ना के पीडीएफ पढ़ात नइखे. अह अंक में बावे नया लोकतंत्र के सपना (संपादकीय), लोकतंत्र में लोकभावना के बेमिसाल जीत (अन्ना के आंदोलन पर रिपोर्ताज), राजगुप्त के लिखल व्यंग्य रचना “रउरा अइलीं”, स्व॰ जगदीश ओझा “सुन्दर” के दू गो गीत, रामजियावन दास बावला, हीरालाल हीरा, आनन्द संधिदूत, शिवपूजन लाल विद्यार्थी, हजारीलाल गुप्त, जनार्दन प्र॰ द्विवेदी, आ भागवत पाण्डेय के कविता, विष्णुदेव तिवारी के लिखल कहानी “कायर” आ शंभूनाथ उपाध्याय के लिखल कहानी “आखिरी बेरा के संघाती”, लोकसंस्कृति पर विवेचनात्मक लेख “शंखबाजे बलाय भागे”, शिलिमुख के लिखल “लोक के कथा लोककथा”, ऋचा के लिखल लघुकहानी “सार्वजनिक के समानता”. सुरेश कांटक के लिखल नाटक “तारनहार”, आ पुस्तक चर्चा “कसौटी” में भोला प्रसाद आग्नेय के लिखल कहानी संग्रह “पगला पगली”, जनार्दन प्रसाद द्विवेदी के कविता संग्रह “दुनिया दउर रहल बा”, सुरेश कांटक के लिखल नाटक “पहिला नायक”, सुरेशे कांटक के लिखल कविता संग्रह “का ए बकुला” आ अनिल ओझा नीरद के कविता संग्रह “बेचारा सम्राट” के चरचा.

आशा बा कि हमेशा का तरह “पाती” के नयको अंक पढ़ि के रउरा सभे आनन्दित होखब.

संपादक, अँजोरिया

कुछ त कहीं...

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