पुरनका जमाना में रनिवासन में रानी लोग के खटवास-पटवास धरे खातिर एगो अलगे कक्ष भा भवन रहत रहे जवना के कोप भवन कहाव आ जहाँ रुसल आ रिसियाइल रानी लोग जा के खटवास धर लेत रहे. खबर मिलते राजा धावत चहुँप जासु अपना रानी के मनावे खातिर. आजु का जमाना में दिल्ली के जंतर-मंतर नेता लोग खातिर कोप भवन के जगहा लिहले बा.देश के कवनो नेता जब कवनो बात खातिर रुसेला आ रिसियाला त जंतर मंतर पर धरना देबे चहुँप जाला. बाकिर हर रानी कोप भवन में जाके आपन कोप देखावे ई जरुरी ना रहल. कवनो कवनो महारानी अपना महले में खटवास-पटवास कर लेत रही.

पिछला हफ्ता एही तरह एगो सन्यासी जंतर-मंतर का बदले रामलीला मैदान में हठ धर के खटवास-पटवास पर बइठ गइलन. अब बाल हठ आ सन्यासी हठ से जेकरा निबटे पड़ेला उहे जानेला कि कतना मुश्किल काम होला ई. ओह सन्यासिओ के मनावे के पूरा प्रयास कइल गइल आ जब ना मनलन त तड़ी पार करा दिहल गइल. तड़ीपार अंगरेजन का जमाना से चलल आवत बा जब ब्रिटिश सरकार कवनो आदमी से तंग आके ओकरा के जिला बदर भा तड़ीपार कर देत रहे. हमरा बतकुच्चन के ओह तड़ीपार से कवनो लेना-देना नइखे. हम त बस खटवास-पटवास का सिवान का भितरे रहब. उपवास से ऊ बात ना झलक पावे जवन खटवास-पटवास से झलकेला. उपवास त कई कारण से कइल जाला. कबो बीमारी में, कबो कवनो व्रत त्योहार में, आ कबो व्यक्तिगत भा राजनीतिक कारण से. आ एही उपवास के खटवास-पटवास कहल जाला.

खटवास आ खटवसल में तनी फरक होला. खटवसल ओह आदमी का बारे में कहल जाला जे अपना बीमारी भा कमजोरी का चलते खटिया धर लिहले होखे. तब कहल जाला कि ऊ खटवसल बाड़े. बाकिर खटवास तब होला जब केहू कवनो बाति खातिर रुसल भा रिसियाइल हो के खटिया धर लेव आ मुँह अलोत करे खातिर पट पड़ जाव. ना त तहरा के देखब ना तोहरा से कवनो बात करब. इहे खटवास-पटवास धरल कहाले.

3 thought on “बतकुच्चन – १५”
  1. सब्दन के खेल निराला बा…खटवासे के देखिं लीं. ए में खट (खाट यानि खतिया) पर वास…………

  2. दरअसल भासा से जुड़ल होखला से भासा से संबंधित लेख पढ़ले से अपना के रोक ना पावेनी…अउर बतकुच्चन के का पूछे के…..

  3. खटवास-पटवास पर राउर बतकुच्चन बहुत नीक लागल।

    सब्दन के खेल निराला बा…खटवासे के देखिं लीं. ए में खट (खाट यानि खतिया) पर वास। वाह..अउर इ सबद एगो विसेष अर्थ में आ गइल। हाँ पर हम इहाँ इ कहल चाहत रहनी हँ कि जब सबदन में संधि होला त पहिलका सब्द (अगर खाट जइसन सबद बा—अधिका जगहि) उ आ के मात्रा निकलि के खट हो जाला जइसे खटमल…पर खटपट में इ खट नइखे। लाठी से लठमार हो जाला। मथधँक्का (माथ के मथ हो गइल बा)…जय हो…जय हो…अबहिन एतने इयाद आवता। सादर।।

    दरअसल भासा से जुड़ल होखला से भासा से संबंधित लेख पढ़ले से अपना के रोक ना पावेनी…अउर बतकुच्चन के का पूछे के…..

कुछ त कहीं...

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