– ओ.पी. अमृतांशु

भादो के अन्हरिया रात, हमरो जिनिगिया,
दिन पे दिने दिने होता देहिया हरदिया
दिन पे दिने दिने ना.

कहिलें कुशलवा में, बारहो वियोगवा,
दुई टुक होई गईलें, घर के हंडीयवा,
नेह-छोह बाँट गईल, ननदी सवतिया,
दिन पे दिने दिने होता देहिया हरदिया
दिन पे दिने दिने ना.

टुटही पलानी मिलल , कूकुरा हेलानी,
लागि जाला डाभा जब पड़े लागे पानी,
कंहवा डसाई सेज, कइसे जोरीं चुल्हिया,
दिन पे दिने दिने होता देहिया हरदिया
दिन पे दिने दिने ना.

चित्रा बरसि गइल, पपीहा गरभाइल,
हमरो गरभवा के दिन नजीकाइल,
छट-पट करे जिया, उठे ला दरदिया,
दिन पे दिने दिने होता देहिया हरदिया
दिन पे दिने दिने ना.

जल्दी से आवऽ ,ना त रोपेया पेठावऽ ,
अपना सजनिया के, गरवा लगावऽ , ,
ना त बस भेंज द तू, तनी सा महुरिया,
दिन पे दिने दिने होता देहिया हरदिया
दिन पे दिने दिने ना.

7 thoughts on “गीत”
  1. संतोष पटेल जी सहित सभी लोगन के हमरा तरफ से धन्यबाद बा .साथ में संपादक महोदय के भी हम आभारी बनी .अंजोरिया में हमरा छोटी – मुकी रचना के जगह मिलल .मन में खुशी के बीज अंकुरा गईल.
    धन्यवाद
    ओ.पी .अमृतांशु

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