डर-भय

by | Nov 1, 2010 | 1 comment

– डॉ. कमल किशोर सिंह

डर बहुरुपिया बनि के आवे,
हरदम दिल दुआरी पे.
कइसे जान बचाईं आपन,
कतना चलीं होशियारी से?

चिकन चेहरा से हम डरीं
की बढ़ल केश मूँछ दाढ़ी से?
भय भगवान से केकरा नइखे,
काहे ज्यादा भय पुजारी से ?

पढ़ल लिखल लोगन से डरीं
की गँवई, अपढ़, अनाड़ी से ?
मईल, कुचैल, निकपडी से
की डरीं सूट-बूट धारी से ?

निर्धन भूखा मजदूर से डरीं
की ठाकुर सेठ पटवारी से ?
चोर-लूटेरा से हम डरीं
की आरक्षक अधिकारी से ?

कागज़ कलम कानून से डरीं
की हसली हल कुदारी से ?
पुलिस सिपाही से हम डरीं,
की डरीं नक्सलबाड़ी से ?

सोचतानी – डरीं हम दवाई से
की बचीं हम बीमारी से ?


डा॰कमल के पहिले प्रकाशित रचना

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