निर्गुण –

देह दुनिया भरम ह बलवान करम गति,
भीतरी के सांच भीतरीये पहचान ले,
बुद्धि कुबुद्धि के फेरा में उलझि मत,
नर सेवा ही सांचो नरायन जप मान ले.

केतनो तू मंहगा घरवा सजइबऽ,
एकदिन छोड़ि सब एहि जा चलि जइबऽ.

मनवा के मांजि धोई रखऽ तू साफ,
एकरे त करनी बस जाई तोहरे साथ,
पैसा से करम गति कीन नाहीं पइबऽ,
एकदिन छोड़ि सब एहि जा चलि जइबऽ.

नाता भरम के निबाहि लेबऽ तू कब ले,
माटी के खेलौना खेलौना बा जब ले,
फेरो राम नाम सत इहे पढ़ावल जइबऽ,
एकदिन छोड़ि सब एहि जा चलि जइबऽ.

दया धरम के जो खजाना भरि लेइबऽ,
जरूरत में केहू के कामे आइ जइबऽ,
राखा भरोस सोझा नरायन के पइबऽ,
एकदिन छोड़ि सब एहि जा चलि जइबऽ.

एहि किरदार के सांच नाही जानऽ,
माया क दोख ह ई एहि के पहचानऽ,
मौका बा मिलल मुकुत होइ जइबऽ,
एकदिन छोड़ि सब एहि जा चलि जइबऽ.

भजन –

लेबऽ अपनाई कि तू, देबऽ ठुकराई,
भगवन उहे नु हवऽ ॥ टेक॥
पाथर अहिल्या तू, दीहलऽ जगाई
भगवन उहे नु हवऽ ॥ टेक॥

गंगा जी के तीरे तीरे, केवटन के गऊॅवा,
मिलल चरणोदक सहजे, धोई राउर पउॅवा,
केवटा के लिहलीं अपना, हिया से लगाई,
भगवन उहे नु हवऽ ॥ टेक॥
लेबऽ अपनाई कि तू, देबऽ ठुकराई,
भगवन उहे नु हवऽ ॥ टेक॥

बन बन फिरी कईलऽ, देवतन के काज हो,
दौरि के बचाई लीहलऽ, द्रौपदी के लाज हो,
बइर खईलऽ जवन दीहलि सबरी जुठियाई,
भगवन उहे नु हवऽ ॥ टेक॥
लेबऽ अपनाई कि तू, देबऽ ठुकराईऽ,
भगवन उहे नु हवऽ ॥ टेक॥

पाप पुण्य देखतऽ त, होखत कइसे काम हो,
बाली अ पूतना जइते, कइसे राउर धाम हो,
रोवे लगलऽ गिद्ध अपना गोदिया उठाई,
भगवन उहे नु हवऽ ॥ टेक॥
लेबऽ अपनाई कि तू देबऽ ठुकराईऽ,
भगवन उहे नु हवऽ ॥ टेक॥

ध्रुव प्रह्लाद, अजामील सुदामा,
केकर केकर केतना, बताई हम नामा,,
हमरो ओरिया ताकऽ, सनेहिया लगाई
भगवन उहे नु हवऽ ॥
भगवन उहे नु हवऽ ॥

सम्पर्क – महेंद्र नाथ दूबे,
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