(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 11वी प्रस्तुति)

– मनोकामना सिंह

शाम के, घर लवट के अइला पर
देख के चेहरा उदास
पूछली माधो के मेहरारू
रउरा मुँह काहे लटकवले बानीं?
बंगला के पाँच अस बनवले बानीं ?

कहलें माधो, ”का कहीं,
कपार बथऽता टन-टन करऽता“!
”अजी राउर कपार ह
कि मंदिर के घंटी !
जे टन-टन करऽता
हई गोली खई, पानी पीहीं
तुरुते ठीक हो जाई !
हम एगो सीरियल देखे जात बानी
खतम हो जाई त चाह बनाइब
चाह पी के रउरो बजारे जाइब
हरिअर तरकारी कीन के ले आइब !“

मेहरारू के बात सुन के
माधो के मन पड़ल आपन माई
जे कपार बथल सुन के
ठंढा तेल लगावत रहलीं
कपार दबावत रहलीं
गरम-गरम दूध पिआवत रहली
गोड़ हाथ दबावत रहलीं
नीन पड़े खातिर बेना डोलावत रहलीं
देवी-देवता के गोहरावत रहली.


पिछला कई बेर से भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका “पाती” के पूरा के पूरा अंक अँजोरिया पर् दिहल जात रहल बा. अबकी एह पत्रिका के जनवरी 2012 वाला अंक के सामग्री सीधे अँजोरिया पर दिहल जा रहल बा जेहसे कि अधिका से अधिका पाठक तक ई पहुँच पावे. पीडीएफ फाइल एक त बहुते बड़ हो जाला आ कई पाठक ओकरा के डाउनलोड ना करसु. आशा बा जे ई बदलाव रउरा सभे के नीक लागी.

पाती के संपर्क सूत्र
द्वारा डा॰ अशोक द्विवेदी
टैगोर नगर, सिविल लाइन्स बलिया – 277001
फोन – 08004375093
ashok.dvivedi@rediffmail.com

कुछ त कहीं...

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