– जयंती पांडेय

बाबा लस्टमानंद गाँव से कोलकाता अइले. इहाँ उनुका एक जाना प्रोफेसर भेंटइले. जइसन नाँव वइसन सुभाव. नांव किरपा जी आ सुभावो एकदम किरपालु. बाबा से बतियावत में उनका से दोस्ती हो गइल. पता चलल कि ऊ प्रोफेसर साहेब महात्मा गाँधी के नांव पर वर्धा में खुलल एगो आनभरसिटी में पढ़ावेलें आ कोलकाता में ओकर सेंटर इंचार्ज हउवन.

ऊ बाबा के बोला के ले गइले आ लगले कक्षा देखावे. एगो कक्षा में मार लइका लइकी वेब पत्रकारिता पढ़त रहले सँ. बात चलल त बाबा कहले, गाँव मे सबेरे नौ बजे आवेला. हमनी का बईठ के ओकरा बांचेनी सँ. एतने में एगो लइकी कहलस, का बाबा अबो अखबार पढ़ऽतारऽ? एकदम बैकवार्ड बाड़ऽ. हमनी का त नेटे पर समाचार पढ़ लीला. बाबा कुछ ना बोलले. ऊ आपन बात चालू रखलसि. का हो बाबा टीवी, मोबाइल, नेटो का जमाना में ई आर्ट फिलिम नाहिन अखबारे में घुसल रहऽतारऽ? कबो मॉडर्निइबऽ ना का? अखबारन के अब कवनो मतलब होला?

बात बाबा लस्टमानंद से बरदास्त ना भइल. कहले, बस चुप रहऽ. मतलब काहे नइखे अखबार के? देस में चाहे बिदेस में यात्रा कइल बिल्कुले छोड़ दिहलू का? चप्पल का में लपेट के धरबू कपड़न का बीच वीआईपी सूटकेस में? बतावऽ आ जान जा कि जदि रेल (जइसन कि होइबे करेला) लेट से चलो आ पूरा स्टेशन मुसाफिरन से खचाखच भरल होखो त बइठबू कहवाँ? कि खड़े खड़े दू घंटा गुजार देबू? भीड़ अइसहीं त ना लाग जाला? रोज पार्टी के रैली आ लोग के सफर कइल जरूरी. अब गइल तोहार रिजर्व सीट. ओकनी से कुश्ती लड़बू? गुंडा लोग से… नेता लोग से? तब का पर बइठ के सफर करबू? इहे अखबार काम आई न, बोलऽ.. चलऽ, कहीं घूमे मत जा.. घरे में ढुक के किताब पढ़त रहऽ त अलमरिया में बिना अखबार बिछवले किताब रखबू? बतावऽ एकर कवनो अल्टरनेट बा? गरमी के हालत देखले बाड़ू न? बिजली चल जाई त पढ़त रहीह किताब. तब अखबारे पंखा बनी आ गर्मी दूर करी.

हमरा गाँव के नथुनी साव आ तहरा मुहल्ला के दोकानदार अखबारे के ठोंगा बना के हमरा होस के पहिले से घुघनी, जिलेबी बेचत आवऽतारे. काहे गरीब के पेट के खयाल ना आइल तहरा? चलऽ ना आइल खयाल, करेजा ना पसीजल तहार, मरे द गरीबन के भूखे, जब चना पैदा करेवाला भूखे मुअऽता त घुघनी बेचे वाला के के पूछऽता?

एही अखबार में छपल रहे न कि केतना किसान आत्महत्या क लिहले सं. टीवी न्यूज त रिवाइंड ना होई बाकिर पुरान अखबार बताइए दी. तनी खोजऽ त.

जाए द, कहाँ मन खट्टा करबू. मगर तहार छोटका भाई भा भतीजा जे घर में बा ओकरा महतारी से पूछीह। केतना काम आवे ला अखबारॆ आउर उ महँग साड़ी, रेसमी के बीच में का धरेली? कबो देखले बाड़ू ई जीन्स के पहिरावा से अलगा? अउर जे कबो पिकनिक फिकनिक गइल होखऽ त पूड़ी खा के कवन चीज से हाथ पोंछेलू? अब कहऽ त अखबार के कवनो मतलब बा कि ना?

वइसे अइसन बात कवनो प्रिंट मीडिया के पत्रकार से मत कहि दीहऽ. बड़ा ठेस लागी. का बुझतारू ऊ कहीं कलर्की क ली. पुलिस के हड़का के काम करवावे में जवन मजा पत्रकार उठावेला ऊ तूं का जनबू. जे जनतू त अइसन बात कहबे ना करतू. ई अखबार ह के हर भिनसारे दुनिया भर के बड़े बड़े दुख के मुख्य पृष्ठ पर छाप के लोग के अहसास दिआवेला कि तोहार दुख केतना छोट बा. केतना बड़हन सामाजिक जिम्मेदारी निभावेला ई हमार अखबार.


जयंती पांडेय दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. हईं आ कोलकाता, पटना, रांची, भुवनेश्वर से प्रकाशित सन्मार्ग अखबार में भोजपुरी व्यंग्य स्तंभ “लस्टम पस्टम” के नियमित लेखिका हईं. एकरा अलावे कई गो दोसरो पत्र-पत्रिकायन में हिंदी भा अंग्रेजी में आलेख प्रकाशित होत रहेला. बिहार के सिवान जिला के खुदरा गांव के बहू जयंती आजुकाल्हु कोलकाता में रहीलें.

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