का हऽ पीएसी अउर जेपीसी के चक्कर

– जयंती पांडेय

संसद के आखिरी दिन बाबा लस्टमानंद से रामचेला पूछलें, ई पीएसी आ जेपीसी का हऽ ? केहु नईखे पूछत कि का चाहीं. बस विपक्ष चिल्ला रहल बा कि दूनू चाहीं. आ सरकार के कहल हऽ कि जब एगो बा तऽ दोसरका का होई ? विपक्ष जिदिया गइल बा कि पीएसी बा, बाकी जेपीओसी चाहीं. सरकार कहतिया कि – अरे जब पीएसी बड़लहीं बा तऽ जेपीसी काहे चाहीं? विपक्ष अड़ल बा कि – जेपीसी ना मिली तऽ संसद नां चली. सरकार निहोरा करतिया – संसद चले दऽ लोगिन. विपक्ष छरिया गइल बा – तऽ जेपीसी काहें नइखऽ देत ? सरकार कहतिया कि ऊ त ना भेंटाई. विपक्ष के भाई लोग ताल ठोंक के कहता कि तब संसदो ना चली. रामचेला सांस लेवे के खातिर तनिक बिलमले.

एतने में बाबा कहले, पीएसी ह संसद के (पब्लिक अकाउंट्स कमेटी) कमेटी जवन सरकार के खर्चा के हिसाब-किताब देखेले आ जेकर अध्यक्ष होला विपक्ष के नेता. लेकिन बुझाता कि ई विपक्ष खातिर बहुत शुभ ना हऽ. पहिले जसवंत सिंह जी एकर अध्यक्ष बनले, तो ऊ आपन किताब लेके एकोराह खड़ा हो गइले आ पार्टी दोसरा ओर. आखिर में पार्टी से निकालल गइलें. अब मुरली मनोहर जोशी एकर अध्यक्ष बाड़ें, त ऊ आपन पीएसी के ले के एक ओर खड़ा बाड़ें आ पार्टी दोसरा तरफ खड़ा हो के जेपीसी मांगतिया.

जेपीसी हऽ – संयुक्त संसदीय कमेटी. ई कभी-कभी बनेले, आ तबे बनेले जब घोटाला होला. एक बेर बनल रहे बोफोर्स खातिर, फेर बनल हर्षद मेहता के शेयर घोटाला के जांच खातिर, आउर फेर बनल केतन पारिख के शेयर घोटाला के जांच खातिर. शेयर घोटालन के ई श्रेय जाला कि तीन में से दू गो जेपीसी ओकरा नांव पर बा. खैर, एकर नतीजा का भइल सभे जानत बा. ठेंगा! तबो विपक्ष अक्सर जेपीसी मांगेला, आ सरकार देले ना. पर अब ऊ फेर स्पैक्ट्रम घोटाला के जांच खातिर जेपीसी मांग रहल बा आ सरकार देत नइखे, संसद चलत नइखे. अब जोशीजी कह रहल बाड़ें कि पीएसी ई घोटाला के जांच कर सकेले. असल में जोशीजी कबो बीजेपी के टॉप थ्री में होत रहलें. अटलजी आ आडवाणीजी का साथ पोस्टरन में छपात रहलें. बाकिर धीरे-धीरे ऊ पार्टी के पोस्टरन से गायब भइले आ फेर टॉप में भी ना रहलें.

एकर वजह अटलजी वाला ना रहे कि लचार हो गइल बाड़े. एकर वजह आडवाणीओजी वाली ना रहे कि कवनो जिन्ना टाइप विवाद खड़ा क दिहले होखस. ई सही हऽ कि आडवाणीजी जब-जब प्रधानमंत्री पद खातिर दावा पेश कइले, ऊ विवाद खड़ा
कइलें. लेकिन जोशीजी अइसन कवनो विवाद खड़ा नइखन कइले जेहसे संघ नाराज हो जाय. इहे नाहीं राजग सरकार में उहे त एगो मंत्री रहले जे दिलोजान से संघ के अजेंडा के लागू कइलें, एही से उनका के हमेशा संघ पसंद कइलसि. अलबत्ता पार्टी के कुछ नेता लोग उनका के कबहुं पसंद ना कइल आ ऊ हाशिया पर चल गइलें.

एको दिन संसद ना चलल, पूरा देश इंतजार करत रह गइल कि विपक्ष के जेपीसी मिली कि नाहीं, अब जोशीजी कह रहल बाड़ें कि उनकर अध्यक्षता वाली पीएसी राजा के घोटाला के जांच करे में सक्षम बा, जैसे कह रहल बाड़ें कि उहो काफी सक्षम बाड़ें. शायद उनका लागता कि जब सरकार उनकर महत्व समुझ रहल बा अउर मान रहल बा कि पीएसी ई जांच कर सकेले, त जेपीसी मांग के बीजेपी वाला या तो उनकर हैसियत घटा रहल बाड़े भा उनकर हैसियत मानते नइखन. उनका इहो लागत होई कि उनका के दरकिनार कइल जा रहल बा, जे कि शायद उनका हमेशे लागत रहेला. चाहे इहो हो सकेला कि उनका बुझात होखो कि ई पार्टी में खुदे आपन हैसियत देखावे के जमाना हऽ.


जयंती पांडेय दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. हईं आ कोलकाता, पटना, रांची, भुवनेश्वर से प्रकाशित सन्मार्ग अखबार में भोजपुरी व्यंग्य स्तंभ “लस्टम पस्टम” के नियमित लेखिका हईं. एकरा अलावे कई गो दोसरो पत्र-पत्रिकायन में हिंदी भा अंग्रेजी में आलेख प्रकाशित होत रहेला. बिहार के सिवान जिला के खुदरा गांव के बहू जयंती आजुकाल्हु कोलकाता में रहीलें.