– जयंती पांडेय

बाबा लस्टमानंद एकदम मूड में रहले. आज काल बड़हन नेता लोगन के धमकावे आ ऊहो अपना से छोटकन के धमकावे के मामला पर चर्चा में कहले, जान जा रामचेला कि धमकावे के आपन फायदा होला आ धमकियावे के अलग. जे धमकावे ला ऊ तऽ जान जा कि रातेरात मीडिया में बढ़ि के मसहूर हों जाला आ जेकरा धमकियावल जाला ऊ तऽ भर रात सहानुभूति के छंइटी मूड़ी पर ध के घूमत रहेला. जे धमकावे ला ऊ हीरो हो जाला आ जेकरा के धमकावल जाला ऊ….

रामचेला कहले, जीरो!

बाबा कहले , भाग बुड़बक, आजु मीडिया के जमाना में केहु जीरो ना होला. जेकरा धमकावल जाला ओकर सब दोस माफ. लोग लागेला पुचकारे, सहानुभूति देखलावे. लागे ला लोग कहे कि ‘अरे ऊ कमवा तऽ ठीके करत रहे बाकिर बड़का लोगवा करे देउ तब नु?’ अइसन हालत में ऊ आदमी कम आ बेचारा बेसी लागेला. बस रोआइन मुंह बनवले चुपचाप चारु ओर तिकवत रहेला. शालीनता के मुखौटा लगवले रहेला. अइसन मुखौटा पहिलको जमाना में रहे आ आजुओ बा आ काल्हुओ रही. हर पार्टी के हर बड़हन नेता के अइसन मुखौटा के दरकार होला. काहे कि ऊ अचके बहड़हन त बन ना गइल. जइसे सासो कबहुओं पतोह होली सन, दहीओ कबहुं दूध होला ओसही बड़को नेता छोटका नेता रहेला आ हमेसा बड़कन के आगे छोट बनत रहे के परेला. लेकिन जान जा कि ई मुखौटन के परसानी तब बढ़ जाला जब ऊ अपना के असली चेहरा बूझे लागे. जबले नाप के मुस्काई आ तौल के बोली तबले त ठीक बा जसहीं ऊ अपना के प्राणधारी बूझे लागी ओसहीं संकट चालू हो जाई आ ओकरा के उपेक्षा के गरम कुंड में बिग दियाई.

मुखौटन के परसानी ई बा कि ऊ हमेसा एके नाहिन रहेले सन. ना दुख में दुखी ना सुख में सुखी. आ एने लोकतंत्र के मजबूरी होला कि हमेसा नाटक करे के परे ला आ जब हंसे के चाहे खुशी देखावे के बेरा आवे ला त ऊ लागे ला मुंह बिसूरे. बिना आला कमान के परमिसन के ऊ त कुछ ना कर सके. अइसन मोका पर उहे सफल होला जे आपन चदर देखि के गोड़ पसारी आ जगहि देखि के पांख निकाली. मुखौटा सदा हरान रहेले सन आ रोआइन मुंह बना के कुर्सीमान रहे ले सन. आपन कवनो पहचान ना बने.


जयंती पांडेय दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. हईं आ कोलकाता, पटना, रांची, भुवनेश्वर से प्रकाशित सन्मार्ग अखबार में भोजपुरी व्यंग्य स्तंभ “लस्टम पस्टम” के नियमित लेखिका हईं. एकरा अलावे कई गो दोसरो पत्र-पत्रिकायन में हिंदी भा अंग्रेजी में आलेख प्रकाशित होत रहेला. बिहार के सिवान जिला के खुदरा गांव के बहू जयंती आजुकाल्हु कोलकाता में रहीलें.

कुछ त कहीं...

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